कविता में शरारती चूहा

कविता में जिस शरारती का जिक्र है, वह कोई और नहीं, बल्कि छोटा सा लेकिन बहुत चंचल चूहा है। यह छोटा-सा जीव घर के कोने-कोने में छिपकर रहता है और अपनी शैतानियों से सबको परेशान कर देता है। कागज के टुकड़े हों, पुराने कपड़े हों या फिर किताबों के पन्ने – चूहा इन सब को अपने दांतों से कुतरने से बाज नहीं आता।

खुर-खुर करते हुए वह अचानक कहीं नजर आ जाता है और फिर आंख झपकते ही किसी अंधेरे कोने में गायब हो जाता है। उसकी छोटी-छोटी चाल, टर-टर की आवाजें और भागते हुए पैरों की आहट – सबकुछ उसके शरारती स्वभाव को दर्शाता है।

दिनभर वह घर के आसपास इधर-उधर भागता रहता है, मानो किसी को नजर न आए। लेकिन उसके निशान – कुतरे हुए सामान, फैली चीजें – साफ बताते हैं कि यहाँ कोई शैतान घूम रहा है। कई बार तो बच्चे उसे देखकर डर जाते हैं, लेकिन कुछ कविताओं में तो इस चूहे को मजाकिया अंदाज में पेश किया जाता है।

चूहा शायद छोटा है, लेकिन उस

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