तिलक के स्वराज का अर्थ: एक जन आंदोलन की नींव

“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा।” यह ऐतिहासिक नारा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का है, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक नए आयाम की शुरुआत की। तिलक के लिए स्वराज केवल अंग्रेजों से आजादी नहीं थी, बल्कि यह व्यक्ति के स्वशासन और राजनीतिक समुदाय के स्वायत्तता का सिद्धांत था।

उनके अनुसार, सच्चा स्वराज तभी संभव है जब आम आदमी अपने जीवन, अपने निर्णय और अपनी सरकार पर नियंत्रण रख सके। यह सिर्फ एक राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि सामाजिक जागृति का आह्वान था। तिलक ने इस विचार को जन-जन तक पहुँचाने के लिए गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव जैसे लोकप्रिय आयोजनों का उपयोग किया, जिससे स्वदेशी भावना को बल मिला।

उनका स्वराज गांधीजी के स्वराज से भिन्न था। जहाँ गांधी अहिंसा और नैतिक परिवर्तन पर जोर देते थे, वहीं तिलक ने संघर्ष और संगठन को प्राथमिकता दी। लेकिन दोनों का लक्ष्य एक था—भार

यह भी देखें

विस्तृत लेख

संबंधित विषय