हिंद स्वराज: एक आंदोलन की आत्मा

“हिंद स्वराज” कोई साधारण नारा नहीं, बल्कि भारत की आजादी के संग्राम की आत्मा थी। हालांकि, यह नारा सीधे तौर पर महात्मा गांधी के विचारों से जुड़ा है, जिन्होंने 1909 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ लिखी। इस किताब में उन्होंने अंग्रेजी शासन की आलोचना करते हुए स्वराज की अवधारणा को नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक आधार पर परिभाषित किया।

लेकिन जब बात स्वराज के जन्मसिद्ध अधिकार की आती है, तो उसका नाम बाल गंगाधर तिलक से जुड़ता है। उनका ऐतिहासिक नारा, “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा”, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा देने वाला साबित हुआ। यह नारा 1906 के आसपास चर्चित हुआ और लाल, बाल, पाल त्रय के नेतृत्व में राष्ट्रवादी भावना को जन-जन तक पहुँचाया।

तिलक के स्वराज का अर्थ राजनीतिक स्वतंत्रता थी, जबकि गांधी के लिए हिंद स्वराज का अर्थ आत्मनियंत्रण, सादगी और अहिंसा पर आधारित समा

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