भारत में ब्रिटिश शासन की शुरुआत: व्यापार से सत्ता तक का सफर

भारत में अंग्रेजों का आगमन मूल रूप से एक व्यापारिक कंपनी के रूप में हुआ था। शुरुआती दिनों में ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्य ध्यान भारत के समृद्ध संसाधनों जैसे रेशम, नील, कपास, चाय और अफीम का व्यापार करके अधिक से अधिक मुनाफा कमाने पर था। भारत के ये उत्पाद यूरोपीय बाजारों में बेहद लोकप्रिय थे और इनसे अंग्रेजों को भारी आर्थिक लाभ होता था।

हालांकि, व्यापार के दौरान अंग्रेजों ने भारतीय समाज का बारीकी से अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि उस समय भारत सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तौर पर बेहद अस्त-व्यस्त था। देश कई छोटी-छोटी रियासतों में बटा हुआ था और राजाओं व स्थानीय शासकों के बीच आपस में गहरा मतभेद था। राष्ट्रीय एकता की कमी और लोगों के बीच की इस आपसी फूट को अंग्रेजों ने अपनी सबसे बड़ी ताकत माना।

भारतीयों के बीच इसी विभाजन और मतभेद को देखकर अंग्रेजों के मन में भारत पर शासन करने की महत्वाकांक्षा जागी। उन्होंने 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपनाकर धीरे-धीरे व्यापारिक नियंत्रण को राजनीतिक सत्ता में बदल दिया। इस प्रकार, जो अंग्रेज केवल व्यापार करने आए थे, वे धीरे-धीरे पूरे भारत के शासक बन बैठे।

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