संगीत में शौर्य का प्रतीक: राग 'अटल विजयश्री'
भारतीय शास्त्रीय संगीत परंपरा में विविध भावों, ऋतुओं और रसों के अनुसार अनेक रागों की रचना हुई है, लेकिन सैन्य विजय का उत्सव मनाने वाले राग अत्यंत दुर्लभ हैं। उत्तर भारतीय संगीत के इतिहास में 'अटल विजयश्री' एक ऐसा विशेष और इकलौता राग माना जाता है, जो सीधे तौर पर सैन्य विजय और राष्ट्र के पराक्रम पर आधारित है।
इस राग की धुनों में जहाँ एक तरफ देश के वीर सैनिकों के अदम्य शौर्य और बहादुरी की गूंज सुनाई देती है, वहीं दूसरी ओर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साहस और दूरदर्शी नेतृत्व का रंग भी देखने को मिलता है। कारगिल युद्ध की विजय के बाद इस राग के माध्यम से भारतीय सेना के बलिदान और देश के गौरव को शास्त्रीय संगीत के पन्नों में अमर कर दिया गया।
संगीत गुरु कल्ला उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत में विजय पर आधारित रागों की कमी के पीछे मुख्य कारण सदियों की पराधीनता को मानते हैं। उनका कहना है कि लंबे समय तक गुलामी के दौर में रहने के कारण भारत में विजय पर्वों पर स्वतंत्र रचनाओं का सृजन नहीं हो सका। वे मानते हैं कि किसी भी युद्ध में सैनिकों का शौर्य मैदान जीतता है और सम्राटों का मार्गदर्शन उस जीत को स्थायित्व देता है। राग 'अटल विजयश्री' इसी शौर्य और कुशल नेतृत्व के अद्भुत तालमेल की संगीतमय प्रस्तुति है।
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