भगवान कार्तिकेय की पूजा कम क्यों होती है?
हिंदू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े पुत्र कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति माना जाता है। उन्होंने तारकासुर जैसे शक्तिशाली राक्षस का वध करके ब्रह्मांड की रक्षा की थी। दक्षिण भारत में उन्हें 'मुरुगन' के नाम से बेहद श्रद्धा के साथ पूजा जाता है, लेकिन उत्तर भारत में उनके मंदिरों और पूजा का प्रचलन अन्य देवताओं की तुलना में काफी कम है। इसके पीछे कुछ पौराणिक कथाएं और मान्यताएं हैं।
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों, कार्तिकेय और गणेश के सामने पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाने की शर्त रखी। कार्तिकेय अपने वाहन मयूर (मोर) पर बैठकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करने निकल पड़े। दूसरी ओर, भगवान गणेश ने अपनी बुद्धिमानी का परिचय देते हुए अपने माता-पिता के चारों ओर चक्कर लगा लिया, क्योंकि शास्त्रों में माता-पिता को ही पूरे ब्रह्मांड के समान माना गया है।
जब कार्तिकेय लौटकर आए और गणेश को विजेता घोषित देखा, तो वे अत्यंत क्रोधित और निराश हो गए। इस नाराजगी के कारण उन्होंने विवाह न करने का संकल्प लिया और क्रौंच पर्वत पर चले गए। माना जाता है कि इसी वैराग्य और क्रोधित रूप के कारण लोग गृहस्थ जीवन में उनकी पूजा करने से थोड़ा संकोच करते हैं। हालांकि, दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल में उनकी महिमा अपरंपार है, जहां उन्हें ज्ञान, शक्ति और युवाओं के देवता के रूप में पूजा जाता है।
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