सुदामा की दीनदशा और श्रीकृष्ण के आँसू

भारतीय इतिहास और साहित्य में मित्रता की जब भी बात होती है, तो श्रीकृष्ण और सुदामा का नाम सबसे पहले लिया जाता है। इनकी दोस्ती निश्छल प्रेम और समर्पण का सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्षों के अलगाव के बाद, जब सुदामा अपने मित्र श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुँचे, तो वहाँ का दृश्य अत्यंत भावुक करने वाला था।

जब श्रीकृष्ण को पता चला कि उनके परम मित्र सुदामा महल के द्वार पर खड़े हैं, तो वे नंगे पैर दौड़ते हुए उन्हें लेने पहुँचे। लेकिन जैसे ही उन्होंने सुदामा को देखा, वे स्तब्ध रह गए। सुदामा की फटी हुई धोती, कमजोर शरीर और पैरों में चुभे अनगिनत काँटे उनकी घोर दरिद्रता की कहानी बयां कर रहे थे। सुदामा की इस दीनदशा को देखकर श्रीकृष्ण को अत्यन्त दुख हुआ।

अपने प्रिय मित्र की ऐसी हालत देखकर वे अपने भीतर के दर्द को रोक नहीं पाए। दुख के कारण श्री कृष्ण की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। स्थिति यह थी कि सुदामा के पैर धोने के लिए जो पानी मँगाया गया था, श्रीकृष्ण ने उसे छुआ तक नहीं; उनके अपने आँसुओं से ही सुदामा के पैर धुल गए। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची मित्रता में ऊँच-नीच, अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होता, केवल प्रेम की भाषा मायने रखती है।

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