तुलना करना है स्वभाव, लेकिन कैच कैसे पकड़ते हैं?

तुलना करना मानव-स्वभाव है। हम दिनभर कई लोगों और चीजों के साथ खुद की तुलना करते रहते हैं। एक आमिर खान की सफलता देखकर लगता है कि हम कम क्यों नहीं कर पाए? या फिर पड़ोसी के बच्चे ने जल्दी नौकरी पाकर घर वालों का सिर ऊँचा कर दिया, हम क्यों नहीं?

लेकिन यही तुलना कभी-कभी बड़ा कैच छुपाए बैठी होती है। हम दूसरों के सफर को देखकर अपने आप को कमतर आंकने लगते हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि दूसरे के पीछे छिपा परिश्रम, गिरना, उठना और संघर्ष हम कितना जानते हैं?

हाँ, तुलना हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सकती है, लेकिन अगर वह हमारा आत्मविश्वास घटाने लगे, तो फिर वह एक जाल बन जाती है। असली कैच यही है — हम दूसरों के अनुभव को अपना मापदंड बना लेते हैं, जबकि हर किसी का रास्ता अलग होता है।

तो अगली बार जब मन में तुलना का ख्याल आए, तो खुद से पूछें — क्या मैं इससे प्रेरित हो रहा हूँ या बुरा महसूस कर रहा ह

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