गुरु और भगवान: कौन बड़ा है?
हमारे समाज और संस्कृति में यह सवाल सदियों से पूछा जाता रहा है कि गुरु और भगवान में से कौन बड़ा है? यह एक ऐसा आध्यात्मिक प्रश्न है जो हर जिज्ञासु के मन में कभी न कभी जरूर उठता है। कबीरदास जी ने अपने एक प्रसिद्ध दोहे में इसका बहुत ही सुंदर उत्तर दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों एक साथ सामने खड़े हों, तो सबसे पहले गुरु के चरण छूने चाहिए।
ऐसा इसलिए है क्योंकि गुरु ही वह माध्यम हैं जो हमें भगवान तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। भगवान ने हमें यह जीवन दिया है, लेकिन उस जीवन को सही दिशा में कैसे जीना है और ईश्वर को कैसे पाना है, यह ज्ञान हमें सिर्फ एक सच्चे गुरु से ही मिल सकता है। बिना गुरु के मार्गदर्शन के इंसान अज्ञानता के अंधेरे में भटका रहता है।
देखा जाए तो गुरु और भगवान के बीच कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। भगवान ब्रह्मांड के रचयिता हैं, तो गुरु उस रचयिता की पहचान कराने वाले मार्गदर्शक हैं। इसलिए, गुरु का स्थान भगवान से भी ऊपर माना गया है, क्योंकि वे हमारे भीतर के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। गुरु के बिना भगवान की प्राप्ति असंभव है, इसीलिए जीवन में एक सही गुरु का होना सबसे बड़ा सौभाग्य है।
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