गर्भावस्था में वजन बढ़ना: क्या है इसके पीछे का विज्ञान?

गर्भावस्था हर महिला के जीवन का एक खूबसूरत और जादुई सफर होता है। इस दौरान महिला के शरीर में कई तरह के शारीरिक बदलाव आते हैं, जिनमें से सबसे आम और स्पष्ट बदलाव है वजन का बढ़ना। अक्सर लोग सोचते हैं कि यह बढ़ा हुआ वजन केवल शिशु के विकास के कारण होता है, लेकिन हकीकत में माँ का शरीर आने वाले नन्हे मेहमान की सुरक्षा और पोषण के लिए कई अन्य स्तरों पर भी तैयारी कर रहा होता है।

गर्भावस्था के नौ महीनों के दौरान, माँ के शरीर के भीतर एक पूरा नया तंत्र विकसित होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो इस अवधि में गर्भाशय की मांसपेशीय परत बहुत तेजी से फैलती है, जिसके कारण गर्भाशय का अपना वजन ही लगभग 0.9 किलोग्राम तक बढ़ जाता है। यह बदलाव शिशु को गर्भ में सुरक्षित रखने के लिए बेहद जरूरी है।

इसके अलावा, बढ़ते हुए भ्रूण तक ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व पहुँचाने के लिए माँ के शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि इस दौरान माँ के शरीर में रक्त यानी खून की कुल मात्रा में भारी इजाफा होता है, जो वजन में करीब 1.2 किलोग्राम की बढ़ोतरी करता है। सिर्फ खून ही नहीं, बल्कि शरीर को हाइड्रेटेड रखने और कोशिकाओं के कामकाज को सुचारू बनाने के लिए शरीर में अतिरिक्त तरल पदार्थ (फ्लुइड) भी जमा होता है, जिसका वजन भी लगभग 1.2 किलोग्राम के आसपास होता है।

अगर इसमें शिशु का वजन, प्लेसेंटा (नाल) और एमनियोटिक द्रव को भी जोड़ दिया जाए, तो एक स्वस्थ महिला का वजन पूरी गर्भावस्था में औसतन 11 से 16 किलोग्राम तक बढ़ सकता है। यह बढ़ा हुआ वजन इस बात का संकेत है कि माँ का शरीर बिल्कुल सही दिशा में काम कर रहा है और एक नए जीवन को जन्म देने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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