घोष और अघोष ध्वनियाँ: हिंदी व्याकरण का एक महत्वपूर्ण अंग

जब हम बोलते हैं, तो हमारे मुँह से कई तरह की ध्वनियाँ निकलती हैं। भाषा विज्ञान में इन ध्वनियों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है: घोष (Voiced) और अघोष (Unvoiced)। इन दोनों के बीच का मुख्य अंतर हमारी स्वर-रज्जु (Vocal Cords) में होने वाले कम्पन पर निर्भर करता है।

घोष ध्वनियाँ: बोलते समय जब हवा हमारे गले से बाहर निकलती है और स्वर-रज्जु में कम्पन या गूँज पैदा होती है, तो उन्हें घोष ध्वनियाँ कहते हैं। उदाहरण के लिए, जब आप "ब" या "ज़" का उच्चारण करते हैं, तो गले में एक हल्का कम्पन महसूस होता है। हिंदी वर्णमाला के प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवाँ वर्ण (जैसे ग, घ, ङ) घोष ध्वनि के अंतर्गत आता है। इसके अलावा सभी स्वर भी घोष होते हैं।

अघोष ध्वनियाँ: इसके विपरीत, जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वर-रज्जु में कोई कम्पन नहीं होता और हवा बिना किसी गूँज के आसानी से बाहर निकल जाती है, उन्हें अघोष ध्वनियाँ कहा जाता है। उदाहरण के लिए, "प", "स" और "श" अघोष ध्वनियों के सबसे अच्छे उदाहरण हैं। वर्णमाला के प्रत्येक वर्ग का पहला और दूसरा वर्ण (जैसे क, ख) अघोष होता है।

इस प्रकार, उच्चारण के दौरान गले में होने वाले कम्पन को समझकर हम घोष और अघोष ध्वनियों के बीच के अंतर को आसानी से पहचान सकते हैं।

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