जैव विकास के प्रमुख सिद्धान्त और नियम

पृथ्वी पर जीवों के निरंतर बदलाव और नई प्रजातियों की उत्पत्ति को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने कई दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। इन्हें ही जैव विकास के सिद्धान्त कहा जाता है। यह प्रक्रिया बताती है कि कैसे जीवन सरल रूपों से आज के जटिल रूपों में विकसित हुआ है।

इस विषय में पहला प्रमुख विचार लैमार्कवाद था, जिसे जीन-बैप्टिस्ट लैमार्क ने दिया था। इसे उपार्जित लक्षणों की वंशागति का नियम भी कहते हैं। इसके अनुसार, जीव जीवन काल में जिन अंगों का अधिक उपयोग करते हैं वे अधिक विकसित होते हैं और यही बदलाव अगली पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं।

इसके बाद चार्ल्स डार्विन ने डार्विनवाद यानी 'प्राकृतिक चयन का सिद्धान्त' दिया। डार्विन के अनुसार, प्रकृति केवल उन्हीं जीवों का चुनाव करती है जो वातावरण के अनुकूल खुद को ढालने में सबसे सक्षम होते हैं। कमजोर या अनुकूलित न होने वाले जीव धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं।

तीसरा सबसे महत्वपूर्ण नियम ह्यूगो डी व्रीज का उत्परिवर्तन सिद्धान्त है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जैव विकास धीमी गति के बजाय आनुवंशिक संरचना में अचानक होने वाले परिवर्तनों (Mutation) के कारण होता है। ये तीनों विचार मिलकर आधुनिक जैव विकास की नींव रखते हैं।

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