कार्बनिक रसायन और जैव शक्ति सिद्धांत का इतिहास

हमारे चारों ओर मौजूद पदार्थों में कार्बन एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्व है। इसकी परमाणु संख्या 6 होती है और इसके बाह्यतम कोश में 4 इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि कार्बन में संयोजक इलेक्ट्रॉनों की संख्या 4 होती है। अपने अष्टक (Octet) को पूर्ण करने और स्थायित्व प्राप्त करने के लिए, कार्बन अन्य परमाणुओं के साथ 4 इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी करता है और सहसंयोजी आबंध (Covalent Bond) का निर्माण करता है। इसी कारण कार्बन असंख्य प्रकार के यौगिक बनाने की क्षमता रखता है।

19वीं शताब्दी की शुरुआत में वैज्ञानिकों का मानना था कि प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले कार्बनिक यौगिकों को प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से नहीं बनाया जा सकता। सन 1815 में प्रसिद्ध स्वीडिश रसायनशास्त्री बर्जीलियस (Berzelius) ने एक अवधारणा पेश की, जिसे जैव शक्ति सिद्धांत (Vital Force Theory) कहा गया। इस सिद्धांत के अनुसार, कार्बनिक यौगिक केवल जीवित जीवों (पौधों और जानवरों) के भीतर मौजूद एक रहस्यमयी या अदृश्य "जैव शक्ति" के प्रभाव से ही निर्मित हो सकते हैं।

लंबे समय तक इस विचारधारा को रसायन विज्ञान में सत्य माना जाता रहा। हालांकि, बाद में 1828 में वैज्ञानिक फ्रेडरिक वोहलर (Friedrich Wöhler) ने प्रयोगशाला में अकार्बनिक पदार्थ (अमोनियम साइनेट) से पहला कार्बनिक यौगिक यूरिया बनाकर इस सिद्धांत को गलत साबित कर दिया। इसके बावजूद, बर्जीलियस का जैव सिद्धांत रसायन विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है, जिसने वैज्ञानिकों को कार्बनिक पदार्थों की गहराई से खोज करने के लिए प्रेरित किया।

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