दरिद्रता की देवी: अलक्ष्मी
सनातन धर्म और भारतीय पौराणिक कथाओं में जहां धन, समृद्धि और वैभव के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है, वहीं उनसे विपरीत गुणों वाली एक और शक्ति का उल्लेख मिलता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी हैं। अलक्ष्मी को धन की देवी लक्ष्मी की बड़ी बहन माना जाता है।
कथाओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था, तब चौदह रत्नों के निकलने से पहले सबसे पहले कालकूट विष और अलक्ष्मी प्रकट हुई थीं। अलक्ष्मी को दुर्भाग्य, निर्धनता, दुख, दरिद्रता और कलह की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। उनके स्वरूप को अक्सर सूखे बालों वाली, वृद्ध और गधे पर सवार महिला के रूप में दर्शाया जाता है, जो पूरी तरह से माता लक्ष्मी के दीप्तिमान रूप के विपरीत है।
माना जाता है कि अलक्ष्मी का वास उन घरों में होता है जहां अस्वच्छता, आलस, क्रोध और अधर्म का बोलबाला होता है। उनसे बचने और जीवन में समृद्धि बनाए रखने के लिए ही घरों को साफ-सुथरा रखा जाता है और दीपक जलाकर नकारात्मकता को दूर किया जाता है। संक्षेप में कहें, तो अलक्ष्मी केवल भौतिक गरीबी का ही नहीं, बल्कि वैचारिक और आत्मिक दरिद्रता का भी प्रतीक हैं।
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