मुस्लिम समाज में नवजात शिशु के जन्म से जुड़े पवित्र संस्कार

किसी भी परिवार में बच्चे का जन्म खुशियों और बरकत का संदेश लेकर आता है। मुस्लिम धर्म में नए मेहमान का दुनिया में स्वागत बड़े ही धार्मिक और आत्मीय तरीके से किया जाता है। नवजात शिशु के जन्म के तुरंत बाद जो सबसे पहला और महत्वपूर्ण संस्कार निभाया जाता है, वह है बच्चे के कान में अज़ान देना।

परंपरा के अनुसार, बच्चे के जन्म लेते ही उसके दाहिने कान में पिता या परिवार के किसी बुजुर्ग द्वारा बहुत ही धीमी और मधुर आवाज में अज़ान के शब्द फुसफुसाए जाते हैं। इसमें "अल्लाह सबसे बड़ा है" और "अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है" जैसे पवित्र शब्द शामिल होते हैं। इस प्रथा का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि बच्चा इस दुनिया में आते ही सबसे पहले ईश्वर का नाम और धर्म के पवित्र वचन सुने।

माना जाता है कि यह संस्कार बच्चे के मन और आत्मा पर गहरा आध्यात्मिक प्रभाव डालता है। अज़ान के बाद प्रायः बच्चे के बाएं कान में इकामत भी कही जाती है। इसके अलावा, बच्चे के तालू पर थोड़ा सा शहद या खजूर घिसकर लगाने की भी पुरानी परंपरा है, जिसे तहनीक कहा जाता है। ये सभी रस्में नवजात शिशु के सुंदर, स्वस्थ और संस्कारवान जीवन की कामना के साथ निभाई जाती हैं।

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