बेटी की विदाई: भावनाओं और मान्यताओं का संगम
बेटी की विदाई एक ऐसा पल होता है जब घर के सभी सदस्यों की आँखें नम हो जाती हैं। माता को विदा करते समय श्रद्धालुओं की आँखों में वैसे ही आँसू होते हैं, जैसे कोई अपनी बेटी को विदा कर रहा हो—यह भावना दहीज भरी विदाई में उमड़ते दर्द को साफ दर्शाती है।
भारतीय संस्कृति में बेटी की विदाई को एक पवित्र संस्कार माना जाता है। इसके साथ ही कई मान्यताएँ भी जुड़ी हैं। ऐसा माना जाता है कि गुरुवार के दिन बेटी को मायके से ससुराल नहीं भेजना चाहिए। इस दिन विदाई करने से मायका गरीब होने की मान्यता है। यह विश्वास हालांकि धार्मिक ग्रंथों में सीधे नहीं मिलता, लेकिन सामाजिक रीति-रिवाजों में गहराई से बसा हुआ है।
कुछ लोग इसे गुरु बृहस्पति की महत्ता से जोड़कर देखते हैं। गुरुवार को गुरु का दिन माना जाता है, और बेटी को विदा करना उस दिन मायके के लिए अशुभ माना जाता है। इसलिए अक्सर विदाई अन्य शुभ तिथियों या दिनों में
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