भगवान और अल्लाह: एक ही परम सत्ता के विविध रूप
हमारे समाज में अक्सर यह सवाल उठते रहता है कि भगवान और अल्लाह में क्या अंतर है। ऊपरी तौर पर देखने पर भाषा, संस्कृति और पूजा-पद्धति के कारण ये दोनों शब्द अलग-अलग प्रतीत होते हैं, लेकिन गहराई में जाने पर इनका संदेश एक ही परम सत्ता की ओर इशारा करता है।
हिन्दू दर्शन और संस्कृत भाषा में भगवान शब्द का प्रयोग उस ईश्वर या सर्वोच्च शक्ति के लिए किया जाता है जो इस सृष्टि का निर्माता और संरक्षक है। सनातन धर्म में ईश्वर को निराकार और साकार—दोनों रूपों में स्वीकार किया गया है। लोग उन्हें राम, कृष्ण, शिव या अन्य रूपों में याद करते हैं, लेकिन अंततः वे सब एक ही परमब्रह्म के स्वरूप माने जाते हैं।
दूसरी ओर, अल्लाह अरबी भाषा का शब्द है, जिसका सीधा अर्थ है 'एकमात्र ईश्वर'। इस्लाम में अल्लाह को निराकार, सर्वशक्तिमान और अद्वितीय माना गया है, जिनकी कोई तुलना नहीं की जा सकती। अरबी बोलने वाले ईसाई और यहूदी भी ईश्वर के लिए 'अल्लाह' शब्द का ही उपयोग करते हैं।
मूल अंतर केवल भाषा, परंपरा और अभिव्यक्ति के तरीके में है, भावना में नहीं। जैसे पानी को अंग्रेजी में 'वाटर', हिंदी में 'जल' और अरबी में 'मा' कहा जाता है, ठीक वैसे ही उस एक सर्वव्यापी शक्ति को अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है।
संक्षेप में कहें तो, नाम और रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन मंजिल और शक्ति एक ही है। आपसी प्रेम, सद्भाव और एक-दूसरे के विश्वास का सम्मान करना ही सच्चा धर्म है।
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