भगवान कब सुनते हैं?

कई बार हम प्रार्थना करते हैं, मंदिर जाते हैं, मंत्र दोहराते हैं, लेकिन फिर भी लगता है कि कोई सुन नहीं रहा। ऐसा क्यों होता है? इसका जवाब छिपा है हमारे मन की गहराई में।

भगवान तब सुनते हैं जब प्रार्थना हृदय से निकलती है। यह न केवल शब्दों का उच्चारण है, न ही छंदों की पुनरावृत्ति। असली प्रार्थना वह है जो मन से उठकर आत्मा तक पहुँच जाए। जब हम सारी लालसाओं, वासनाओं और छोटे-छोटे स्वार्थों से ऊपर उठकर केवल परमानंद की खोज में झुकते हैं, तब प्रार्थना सचमुच गूंजने लगती है।

मंत्र तभी शक्तिशाली होते हैं जब उनके पीछे भावना हो। बिना मन के दोहराए गए शब्द सिर्फ ध्वनि बनकर रह जाते हैं। लेकिन जब हृदय से एक चीत्कार उठता है, तब वह आकाश छू जाता है।

इसलिए भगवान का द्वार खुलता है निष्काम भाव से। जब हम बस इतना नहीं पूछते कि "मुझे यह मिल जाए", बल्कि पूछें — "तुम्हारी मर्जी क्या है?" तब वह सुनते हैं। क्योंकि उनकी नजर न केवल हमारे शब्दों

यह भी देखें

विस्तृत लेख

संबंधित विषय