श्री कृष्ण और देवी रुक्मिणी का अलौकिक प्रेम

सनातन धर्म में भगवान श्री कृष्ण के प्रेम और उनकी लीलाओं की अनेक गाथाएं प्रचलित हैं। जब भी कृष्ण के प्रेम की बात आती है, तो अक्सर लोगों के मन में सबसे पहला नाम राधा जी का आता है। परंतु, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो देवी रुक्मिणी ही भगवान कृष्ण की मुख्य पत्नी और उनके हृदय के सबसे करीब थीं। उन्हें कृष्ण के जीवन में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।

वैष्णव हिंदू परंपरा में देवी रुक्मिणी को धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी लक्ष्मी जी का अवतार माना जाता है। जिस प्रकार भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का संबंध शाश्वत है, ठीक उसी प्रकार धरती पर कृष्ण और रुक्मिणी का प्रेम अटूट और अलौकिक था। रुक्मिणी ने बचपन से ही कृष्ण के गुणों और उनकी महिमा को सुनकर उन्हें अपना पति मान लिया था और कृष्ण ने भी उनके निश्छल प्रेम का मान रखते हुए उनसे विवाह किया।

शास्त्रों के अनुसार, भगवान कृष्ण अपनी सभी रानियों में देवी रुक्मिणी से सबसे अधिक प्रेम और उनका सम्मान करते थे। उनके इसी पावन प्रेम और समर्पण को याद करने के लिए हर साल रुक्मिणी अष्टमी का त्योहार बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। यह पवित्र अवसर देवी रुक्मिणी के जन्मोत्सव का प्रतीक है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं और कृष्ण-रुक्मिणी की पूजा कर सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मांगते हैं। संक्षेप में कहें तो, कृष्ण और रुक्मिणी का रिश्ता केवल एक पति-पत्नी का नहीं, बल्कि दो आत्माओं के मिलन और परम भक्ति का साक्षात उदाहरण है।

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