इस्लाम में ईश्वर की अवधारणा और एकेश्वरवाद
दुनियाभर के विभिन्न धर्मों में पूजा और आस्था के कई रूप देखने को मिलते हैं। जहां कुछ संस्कृतियों में कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, वहीं इस्लाम धर्म की बुनियाद पूरी तरह से एकेश्वरवाद यानी एक ईश्वर के सिद्धांत पर टिकी है। मुस्लिम धर्म में अनेक देवी-देवताओं की कोई अवधारणा नहीं है।
इस्लाम का सबसे मूल मंत्र है—'ला इलाहा इल्लल्लाह', जिसका सीधा और स्पष्ट अर्थ है कि अल्लाह के सिवा कोई दूसरा पूजनीय या ईश्वर नहीं है। संपूर्ण ब्रह्मांड का निर्माता, पालनकर्ता और स्वामी केवल एक ही है, जिसे अल्लाह कहा जाता है। पूरी दुनिया के मुसलमान इसी एक विश्वास पर एकजुट हैं।
इसके साथ ही, इस्लाम में मूर्ति पूजा की सख्त मनाही है। अल्लाह को निराकार माना गया है, इसलिए न तो उसकी कोई तस्वीर बनाई जा सकती है और न ही कोई मूर्ति। केवल अल्लाह ही नहीं, बल्कि उनके आखिरी पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब की भी कोई छवि, चित्र या मूर्ति बनाने की अनुमति इस्लाम में नहीं है। ईश्वर की इबादत बिना किसी मध्यस्थ या भौतिक प्रतीक के सीधे की जाती है। यही कारण है कि मस्जिदों में आपको कोई मूर्ति या तस्वीर दिखाई नहीं देती, बल्कि वहां केवल पवित्र आयतें और कलाकृतियां होती हैं।
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