शिव का जन्म और उनका स्वरूप
सनातन धर्म में भगवान शिव को अनादि और अनंत माना गया है, जिसका अर्थ है कि उनका न तो कोई आरंभ है और न ही कोई अंत। इसलिए, जब हम यह सवाल पूछते हैं कि शिव का जन्म कब हुआ था, तो पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इसका कोई एक निश्चित समय या तारीख नहीं मिलती। वे सृष्टि के निर्माण से पहले भी थे और इसके विनाश के बाद भी रहेंगे।
पौराणिक कथाओं में शिव के प्रकट होने के विभिन्न विवरण मिलते हैं। शिव पुराण के अनुसार, एक बार जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के बीच अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद चल रहा था, तब उनके सामने एक विशाल प्रकाश का स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) प्रकट हुआ। इस स्तंभ का न तो कोई छोर था और न ही कोई अंत। यही प्रकाश स्तंभ भगवान शिव का आदि रूप था। इस प्रकार, शिव का कोई शारीरिक जन्म नहीं हुआ, बल्कि वे स्वयं प्रकट हुए थे।
वास्तव में, शिव केवल एक पौराणिक चरित्र नहीं हैं, बल्कि वे उस परम चेतना का प्रतीक हैं जो इस पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। उन्हें 'स्वयंभू' कहा जाता है, यानी जो स्वयं उत्पन्न हुए हैं। योग परंपरा में शिव को पहला गुरु या आदिगुरु माना जाता है, जिन्होंने मानव सभ्यता को ध्यान और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। संक्षेप में कहें तो, शिव काल और समय के चक्र से परे हैं, वे हमेशा से थे, हैं और हमेशा रहेंगे।
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