श्रुति और स्मृति: भारतीय साहित्य का मौलिक आधार
सनातन परंपरा और भारतीय दर्शन को समझने के लिए श्रुति और स्मृति के अंतर को जानना बहुत आवश्यक है। यह दोनों ही संस्कृत ग्रंथों के वे मुख्य स्तंभ हैं, जिन पर प्राचीन ज्ञान टिका हुआ है।
श्रुति का शाब्दिक अर्थ है "सुना हुआ"। प्राचीनकाल में ऋषियों-मुनियों ने ध्यान और साधना के माध्यम से जो परम सत्य का अनुभव किया, उसे ही श्रुति कहा गया। इसे ईश्वर द्वारा प्रकट किया गया ज्ञान (रहस्योद्घाटन) माना जाता है। श्रुति ग्रंथ अलौकिक और सदा सर्वदा के लिए सत्य माने जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से चार वेद (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद), ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक और उपनिषद शामिल हैं। इन्हें किसी मनुष्य की रचना नहीं, बल्कि अपौरुषेय माना गया है, जिन्हें युगों-युगों से सुनकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाया गया।
दूसरी ओर, स्मृति का शाब्दिक अर्थ है "याद किया हुआ"। ये वे ग्रंथ हैं जो मनुष्यों द्वारा अपनी याददाश्त, अनुभव और सामाजिक आवश्यकताओं के आधार पर लिखे गए हैं। स्मृति ग्रंथ समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य श्रुति के गूढ़ ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में लागू करना है। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, रामायण, महाभारत और पुराण इसी श्रेणी में आते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो, श्रुति भारतीय संस्कृति का अपरिवर्तनीय सिद्धांत है, जबकि स्मृति समाज को सही दिशा देने वाला व्यवहारिक मार्गदर्शन है। जब भी किसी विषय पर दोनों में कोई विरोधाभास होता है, तो श्रुति के ज्ञान को ही सर्वोपरि और अंतिम माना जाता है।
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