भारतीय संगीत और नौ रसों का अलौकिक संगम

भारतीय कला और साहित्य में रसों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। काव्यशास्त्र के अनुसार मुख्य रूप से नौ रसों की मान्यता है, जिन्हें नवरस कहा जाता है। इनमें श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत रस शामिल हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी इन्हीं रसों की अनुभूति होती है, जो श्रोताओं के हृदय में विभिन्न प्रकार के भाव जगाती है।

गायन और वादन दोनों ही कलाओं में नाद (ध्वनि) के माध्यम से रस की निष्पत्ति होती है। गायन में जहाँ शब्दों और काव्य का सहारा लिया जाता है, वहीं वादन में केवल सुरों की मिठास और तरंगों के माध्यम से भाव व्यक्त किए जाते हैं। संगीत में रागों का चयन इस प्रकार किया जाता है कि वे अलग-अलग समय और वातावरण के अनुसार विशिष्ट रस का संचार कर सकें।

भारतीय संगीत के मूलभूत सिद्धांतों के बारे में कहा गया है कि 'श्रुति इसकी जननी तथा लय इसके जनक हैं'। सूक्ष्म ध्वनियों यानी श्रुति और तालबद्ध गति यानी लय के बिना संगीत अधूरा है। जब श्रुति, स्वर और लय आपस में मिलते हैं, तब संगीत में अद्भुत रस बहने लगता है जो मनुष्य की आत्मा को गहराई से छू लेता है।

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