सरसों तेल के बढ़ते दामों के पीछे क्या है असली वजह?
हाल के दिनों में रसोई में इस्तेमाल होने वाले सरसों तेल के दामों में भारी तेजी देखी गई है, जिसने आम बजट को प्रभावित किया है। इस बढ़ोतरी का सबसे बड़ा मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में आयातित खाद्य तेलों (Imported Oils) की बढ़ती कीमतें हैं। जब विदेशी तेल महंगे हो जाते हैं, तो भारतीय बाजारों में देशी तेल और तिलहन की मांग अचानक काफी बढ़ जाती है।
वर्तमान में देश के भीतर सरसों तेल की मांग और आपूर्ति का अंतर 60 बनाम 40 प्रतिशत का है। इसका सीधा मतलब यह है कि घरेलू स्तर पर पैदावार कुल खपत के मुकाबले काफी कम है और बिना आयात के देश की पूरी मांग को पूरा करना संभव नहीं है। यही वजह है कि बाजार में आपूर्ति कम होने और मांग अधिक होने के कारण कीमतों में लगातार उछाल देखने को मिल रहा है।
मंडियों में सरसों तिलहन के भाव 7,490 से 7,540 रुपये प्रति क्विंटल (42 प्रतिशत कंडीशन) के स्तर पर बने हुए हैं। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति में बाधाएं और स्थानीय बाजारों में मांग का दबाव सरसों तेल को महंगा बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक आयात सुचारू नहीं होता और घरेलू स्तर पर तिलहन का उत्पादन नहीं बढ़ता, तब तक दामों में बड़ी राहत मिलना मुश्किल है।
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