सात सुरों का जादू: संगीत का आधार 'सप्तक'

भारतीय शास्त्रीय संगीत की सुरीली दुनिया सात मुख्य स्वरों पर टिकी हुई है। जब इन क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों को एक समूह में पिरोया जाता है, तो उसे सप्तक कहते हैं। संगीत में सप्तक का वही स्थान है, जो किसी भाषा में वर्णमाला का होता है।

इन सातों स्वरों को हम मुख्य रूप से सा, रे, ग, म, प, ध और नि के नाम से जानते हैं। इनका पूर्ण रूप षड्ज (सा), ऋषभ (रे), गंधार (ग), मध्यम (म), पंचम (प), धैवत (ध) और निषाद (नि) है। सप्तक की सबसे दिलचस्प विशेषता यह है कि इसमें प्रत्येक अगला स्वर अपने पिछले स्वर से अधिक ऊँचाई या तीव्रता रखता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो हर बढ़ते स्वर की आंदोलन संख्या (फ्रीक्वेंसी) अपने पिछले स्वर से अधिक होती है, जिससे आवाज़ में चढ़ाव आता है।

संगीत अभ्यास के दौरान गायक अपनी आवाज़ के विस्तार के हिसाब से अलग-अलग सप्तकों का प्रयोग करते हैं, जैसे मंद्र सप्तक (धीमी या भारी आवाज़), मध्य सप्तक (सामान्य आवाज़) और तार सप्तक (ऊँची आवाज़)। इन सातों स्वरों के अनगिनत मेल से ही दुनिया भर की अनूठी धुनें और खूबसूरत राग जन्म लेते हैं।

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