हिंदू धर्म में सत्य की अवधारणा

हिंदू धर्म में सत्य केवल एक नैतिक सिद्धांत नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व की मूल आध्यात्मिक वास्तविकता है। इसे ब्रह्म कहा जाता है—वह अनंत, अविनाशी सत्ता जो सबके भीतर और बाहर विद्यमान है। जैसा कि डॉ. के.एल. शेषागिरी राव के विचारों से स्पष्ट होता है, सत्य यानी ब्रह्म हमारे अस्तित्व का 'अस्तित्व' है—हमारे होने के पीछे का कारण, जीवन का अर्थ और उद्देश्य।

इस दृष्टिकोण में, सत्य केवल शब्दों या घटनाओं की सटीकता तक सीमित नहीं है। यह तो वह आंतरिक ज्योति है जो हर जीव में छिपी है। उपनिषदों में कहा गया है—“सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म”—अर्थात ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनंतता का साकार रूप है। इसलिए हिंदू साधक सत्य की खोज में न केवल बाहरी जगत को देखते हैं, बल्कि आत्मा के भीतर झांकते हैं।

सत्य की यह अवधारणा हमारे नैतिक जीवन को भी आकार देती है। महात्मा गांधी ने भी 'सत्य' को अपने जीवन का मूल सिद्धांत बनाया था।

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