विषय-सूची
- 1. सोवियत संघ के ज़माने से चली आ रही रणनीतिक जुगलबंदी का इतिहास
- 2. हथियारों के सौदों की पेचीदा प्रक्रिया: सरकारी समझौतों से लेकर कारखानों तक
- 3. सुखोई और ब्रह्मोस: संयुक्त निर्माण और घातक मारक क्षमता की एक मिसाल
- 4. इस विषय पर विशेषज्ञों का क्या कहना है?
- 5. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- 6. एक विचारणीय प्रश्न
दुनिया के नक्शे पर जब भी रक्षा बजट और सैन्य आधुनिकीकरण की बात चलती है, भारत का नाम सबसे ऊपर उभरता है। वैश्विक हथियारों के आयात में अकेले 8.2 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाला भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार खरीदार देश बन चुका है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी सिपरी (SIPRI) के सबसे ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, इस विशाल रक्षा बाजार का एकतरफा बादशाह आज भी रूस ही है। भले ही नई दिल्ली ने अपनी टोकरी में अमेरिकी और फ्रांसीसी तकनीक को जगह दी हो, लेकिन भारतीय सेनाओं के बेड़े में 40 फीसदी हथियार आज भी रूसी फैक्ट्रियों से ही बनकर आते हैं।
सोवियत संघ के ज़माने से चली आ रही रणनीतिक जुगलबंदी का इतिहास
भारत और रूस के बीच रक्षा संबंधों की जड़ें केवल एक व्यापारिक समझौते तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह दशकों पुरानी भू-राजनीतिक वफादारी का एक बेजोड़ नमूना है। साल 1960 और 70 के दशक में, जब पश्चिमी ताकतें दक्षिण एशिया में रणनीतिक संतुलन को बिगाड़ने में लगी थीं, तब तत्कालीन सोवियत संघ ने हाथ बढ़ाकर भारत को उन्नत सैन्य साजो-सामान मुहैया कराना शुरू किया। मिग-21 लड़ाकू विमानों से शुरू हुआ यह सफर समय के साथ सुखोई और टी-90 टैंकों तक पहुंच गया। सन् 2011 से 2015 के बीच भारत के कुल सैन्य आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत हुआ करती थी। हालांकि, पिछले कुछ सालों में भारत ने फ्रांस से राफेल और इजराइल से आधुनिक मिसाइल प्रणालियां खरीदकर अपने रक्षा स्रोतों में विविधता लाने की पुरजोर कोशिश की है। इसके बावजूद, भारत की रीढ़ माने जाने वाले पनडुब्बी बेड़े, बख्तरबंद गाड़ियां और वायु सेना के बेड़े में रूसी तकनीक की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें रातों-रात किसी अन्य देश की तकनीक से बदलना नामुमकिन है। यह इतिहास ही आज के मजबूत रणनीतिक गठजोड़ का सबसे ठोस आधार है।
हथियारों के सौदों की पेचीदा प्रक्रिया: सरकारी समझौतों से लेकर कारखानों तक
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रक्षा सौदे किसी दुकान से सामान खरीदने जितने सरल नहीं होते। जब भारत रूस से हथियारों की खरीद करता है, तो यह पूरी प्रक्रिया बेहद सख्त और बहुस्तरीय चरणों से होकर गुजरती है। सबसे पहले, भारतीय रक्षा मंत्रालय और सेना की तकनीकी टीमें अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं (Gsqrs) का निर्धारण करती हैं। इसके बाद दोनों देशों के बीच गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट (G2G) वार्ता शुरू होती है, जिसमें किसी निजी बिचौलिए की जगह नहीं होती। रूस की सरकारी रक्षा निर्यात एजेंसी 'रोसोबोरोनएक्सपोर्ट' इस पूरे लेन-देन की कमान संभालती है। इसके बाद तकनीकी परीक्षण और कीमत को लेकर लंबी सौदेबाजी चलती है। हालिया भू-राजनीतिक तनावों और प्रतिबंधों के दौर में, जब डॉलर में भुगतान करना मुश्किल हो गया, तब दोनों देशों ने एक अनोखा रास्ता निकालते हुए रुपया-रूबल भुगतान प्रणाली को अपनाया। सौदा फाइनल होने के बाद, ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (ToT) के तहत कई हथियारों का निर्माण भारत में ही शुरू किया जाता है। अंत में, गुणवत्ता नियंत्रण की कड़ी जांच से गुजरने के बाद ही ये हथियार भारतीय सैन्य टुकड़ियों के बेड़े में शामिल किए जाते हैं।
सुखोई और ब्रह्मोस: संयुक्त निर्माण और घातक मारक क्षमता की एक मिसाल
भारत और रूस के रक्षा संबंधों की व्यावहारिक ताकत को समझने के लिए सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान और ब्रह्मोस मिसाइल से बेहतर कोई दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता। भारतीय वायुसेना का मुख्य स्तंभ माना जाने वाला सुखोई विमान मूल रूप से रूसी डिजाइन पर आधारित है, लेकिन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने इसका बड़े पैमाने पर भारत में ही असेंबलिंग और निर्माण किया है। वहीं दूसरी तरफ, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल तो दोनों देशों के संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) का एक ऐसा चमत्कार है, जिसने युद्ध के मैदान की परिभाषा ही बदल दी है। भारत के डीआरडीओ और रूस के एनपीओ माशिनोस्त्रोयेनिया ने मिलकर इसे तैयार किया है। यह मिसाइल आज इतनी अचूक और खतरनाक बन चुकी है कि भारत अब इसका निर्यात फिलीपींस जैसे देशों को भी कर रहा है। यह मामला साफ दिखाता है कि भारत अब रूस से केवल हथियार खरीद नहीं रहा, बल्कि सह-विकास के एक नए युग में प्रवेश कर चुका है।
इस विषय पर विशेषज्ञों का क्या कहना है?
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की वर्तमान हथियार खरीद रणनीति में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव दिखाई दे रहा है। सिपरी (SIPRI) की रिपोर्टों का विश्लेषण करते हुए विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत अब किसी एक देश पर अपनी निर्भरता सीमित नहीं रखना चाहता। यही कारण है कि रूस की हिस्सेदारी में लगातार कमी आई है और फ्रांस तथा इजरायल जैसे देश तेजी से प्रमुख साझेदार बनकर उभरे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राफेल विमानों और स्कॉर्पीन पनडुब्बियों जैसे सौदों ने फ्रांस को भारत का एक मजबूत रणनीतिक विकल्प बना दिया है। इसके साथ ही, विशेषज्ञ इस बात पर भी जोर देते हैं कि भू-राजनीतिक तनावों को देखते हुए भारत अपनी 'आत्मानिर्भर भारत' नीति के तहत घरेलू रक्षा उत्पादन को बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, आयात में आई यह आंशिक कमी भारत की आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदमों को दर्शाती है, जिससे आने वाले समय में वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की स्थिति एक आयातक से बदलकर एक बड़े निर्यातक के रूप में स्थापित हो सकती है।
---अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. रूस पर भारत की निर्भरता कम होने का मुख्य कारण क्या है?
रूस पर निर्भरता कम होने का मुख्य कारण भारत की रणनीतिक विविधता और 'मेक इन इंडिया' नीति है। भारत अब युद्ध जैसी वैश्विक परिस्थितियों के बीच आपूर्ति श्रृंखला में होने वाली किसी भी रुकावट से बचना चाहता है। इसलिए, भारत ने फ्रांस और इजरायल जैसे पश्चिमी देशों से आधुनिक तकनीक अपनाना शुरू कर दिया है ताकि किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर न रहना पड़े।
2. वर्तमान में भारत का रक्षा आयात कम क्यों हो रहा है?
भारत के रक्षा आयात में कमी आने की बड़ी वजह देश के भीतर रक्षा उपकरणों का रिकॉर्ड उत्पादन होना है। डीआरडीओ (DRDO), एचएएल (HAL) जैसी सरकारी संस्थाओं और निजी क्षेत्र की कंपनियों की सक्रियता से अब कई मिसाइलें, हल्के लड़ाकू विमान और रडार भारत में ही बन रहे हैं, जिससे विदेशों से खरीद की जरूरत धीरे-धीरे कम हो रही है।
---एक विचारणीय प्रश्न
जिस तरह भारत रक्षा के क्षेत्र में विदेशी हथियारों पर अपनी निर्भरता तेजी से घटा रहा है और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दे रहा है, उसे देखते हुए क्या भारत आने वाले एक दशक में खुद को दुनिया के शीर्ष हथियार निर्यातक देशों की कतार में खड़ा कर पाएगा, या फिर आधुनिकतम तकनीक के लिए हमें हमेशा वैश्विक महाशक्तियों की ओर ही देखना होगा?
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