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पलक झपकते ही दिल्ली से मुंबई का सफर तय हो जाए, तो कैसा लगेगा? यह कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि आधुनिक हाइपरसोनिक हथियारों की खौफनाक हकीकत है। आज दुनिया की सबसे तेज मिसाइल ध्वनि की रफ्तार से भी नौ गुना ज्यादा यानी लगभग मैक 9 की गति से चलती है। रूस की 'जिरकॉन' (Zircon) नाम की यह मिसाइल तकरीबन 11,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से अपने लक्ष्य पर झपटती है। इतनी भीषण गति के सामने दुनिया का कोई भी मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम फिलहाल पूरी तरह बेअसर और लाचार नजर आता है।
ब्रह्मांडीय गति का सैन्य इतिहास और इसकी शुरुआत
शीत युद्ध के दौर में जब महाशक्तियां एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ में अंधी हो रही थीं, तब केवल दूरी मायने रखती थी। अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) अंतरिक्ष की गहराइयों को छूकर वापस धरती पर गिरती थीं। लेकिन उनके रास्ते तय थे, जिन्हें रडार आसानी से पकड़ लेते थे। वक्त बदला और रणनीतिकारों को अहसास हुआ कि सिर्फ दूर तक मार करना काफी नहीं है, बल्कि दुश्मन को सोचने का मौका ही न देना असली ताकत है। यहीं से शुरुआत हुई क्रूज मिसाइलों के आधुनिकीकरण की। भारत और रूस ने मिलकर 'ब्रह्मोस' बनाई, जो दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनी। लेकिन इंसान की रफ्तार की भूख यहीं नहीं रुकी। सैन्य वैज्ञानिकों ने ध्वनि की गति (मैक 1) के दायरे को तोड़कर मैक 5 से ऊपर की दुनिया में कदम रखा, जिसे हाइपरसोनिक युग कहा जाता है। रूस ने इस तकनीक में बाजी मारी और जिरकॉन जैसी घातक मिसाइलों को समंदर की लहरों के नीचे और ऊपर तैनात कर दिया, जिसने वैश्विक सैन्य संतुलन को हमेशा के लिए हिलाकर रख दिया।
हाइपरसोनिक उड़ान का विज्ञान: यह कैसे काम करती है?
इतनी प्रचंड गति हासिल करना किसी चमत्कार से कम नहीं है, क्योंकि हवा खुद एक सबसे बड़ा दुश्मन बन जाती है। सबसे पहले, मिसाइल को एक पारंपरिक सॉलिड-फ्यूल बूस्टर रॉकेट के जरिए हवा में बेहद तेज गति से ऊपर धकेला जाता है। जब मिसाइल एक निश्चित ऊंचाई और सुपरसोनिक रफ्तार पर पहुंच जाती है, तो इसका असली इंजन यानी 'स्क्रैमजेट' (Scramjet) चालू होता है। स्क्रैमजेट इंजन में कोई घूमते हुए पुर्जे या पंखे नहीं होते। यह सामने से आ रही अत्यधिक तेज हवा को सीधे अंदर खींचता है, उसे अपने भीतर ही संकुचित (compress) करता है और उसमें ईंधन मिलाकर धमाका करता है। इस प्रक्रिया से निकलने वाला प्रचंड थ्रस्ट मिसाइल को मैक 9 की गति पर ले जाता है। इस भयानक रफ्तार के दौरान मिसाइल के चारों ओर हवा इतनी गर्म हो जाती है कि वह प्लाज्मा (Plasma) में बदल जाती है। यह प्लाज्मा शील्ड रडार की तरंगों को सोख लेती है, जिससे यह मिसाइल रडार स्क्रीन पर पूरी तरह अदृश्य या 'भूत' बन जाती है।
जिरकॉन का परीक्षण: जब समंदर का सीना दहल उठा
इस अदृश्य ताकत का लोहा दुनिया ने तब माना जब रूसी नौसेना ने बेरेंट्स सागर में इसका एक जीवंत परीक्षण किया। एडमिरल गोर्शकोव फ्रिगेट (युद्धपोत) से एक मिसाइल वर्टिकल लॉन्च ट्यूब से बाहर निकली। शुरुआती कुछ सेकेंड्स में केवल धुआं और आग की लपटें दिखीं, लेकिन जैसे ही स्क्रैमजेट इंजन ने कमान संभाली, आसमान में एक चीखती हुई लकीर खिंच गई। मिसाइल ने करीब 450 किलोमीटर दूर तैर रहे एक काल्पनिक दुश्मन के जहाज को अपना निशाना बनाया था। आम मिसाइलों को इस दूरी को तय करने में कम से कम 20 से 25 मिनट का समय लगता है, जिससे दुश्मन को संभलने और जवाबी कार्रवाई का मौका मिल जाता है। मगर जिरकॉन ने भौतिक विज्ञान के सारे नियमों को धता बताते हुए महज साढ़े चार मिनट के भीतर उस लक्ष्य के परखच्चे उड़ा दिए। युद्धपोत पर मौजूद कमांडरों को जब तक रडार पर कोई विसंगति महसूस होती, तब तक निशाना मलबे में तब्दील हो चुका था। इस परीक्षण ने साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध कला में अब दूरी बेमानी हो चुकी है, सारा खेल सिर्फ और सिर्फ बेतहाशा रफ्तार का है।
विशेषज्ञों का मानना है
रक्षा और एयरोस्पेस विशेषज्ञों के अनुसार, हाइपरसोनिक मिसाइलें भविष्य के युद्धक्षेत्र की पूरी परिभाषा बदल रही हैं। सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि जब कोई मिसाइल मैक 5 (ध्वनि की गति से पांच गुना) या उससे अधिक की रफ़्तार से चलती है, तो मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम (वायु रक्षा प्रणाली) के लिए उसे ट्रैक करना और रोकना लगभग असंभव हो जाता है। विशेषज्ञों का तर्क है कि पारंपरिक मिसाइलों के विपरीत, ये मिसाइलें न केवल बेहद तेज़ होती हैं, बल्कि हवा में अपना रास्ता बदलने (मैन्युवेरेबिलिटी) में भी सक्षम होती हैं। यही कारण है कि आज दुनिया के शक्तिशाली देशों के बीच इस तकनीक को हासिल करने की एक नई होड़ मच गई है। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि इतनी अत्यधिक गति पर घर्षण से पैदा होने वाली गर्मी को झेलने के लिए अभी और उन्नत सामग्रियों (मटेरियल्स) पर शोध की आवश्यकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. क्या दुनिया में कोई ऐसा डिफेंस सिस्टम है जो सबसे तेज़ मिसाइल को रोक सके?
वर्तमान में, दुनिया के अधिकांश पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम जैसे अमेरिका का पैट्रियट (Patriot) या रूस का S-400 भी पूरी तरह से तैयार हाइपरसोनिक मिसाइलों को रोकने में सक्षम नहीं हैं। चूंकि ये मिसाइलें बहुत कम ऊंचाई पर और अत्यधिक गति के साथ अपनी दिशा बदलते हुए आती हैं, इसलिए रडार को इन्हें भांपने और प्रतिक्रिया देने के लिए बेहद कम समय मिलता है। हालांकि, वैज्ञानिक अब लेज़र हथियार और अंतरिक्ष-आधारित ट्रैकिंग सिस्टम पर काम कर रहे हैं जो भविष्य में इन्हें चुनौती दे सकें।
2. भारत की सबसे तेज़ मिसाइल कौन सी है और उसकी गति कितनी है?
भारत की सबसे तेज़ मिसाइल ब्रह्मोस (Brahmos) है, जो दुनिया की सबसे तेज़ क्रूज़ मिसाइल मानी जाती है। इसकी गति लगभग मैक 2.8 से मैक 3 (ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना) है। इसके अलावा, भारत रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के नेतृत्व में हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) पर भी काम कर रहा है, जिसने परीक्षण के दौरान मैक 6 की गति हासिल की है, जो भविष्य की हाइपरसोनिक मिसाइलों का आधार है।
एक विचारणीय प्रश्न
गति की इस अंतहीन दौड़ में जहां मिसाइलें पलक झपकते ही तबाही मचाने के लिए तैयार हो रही हैं, वहां क्या मानव सभ्यता कभी ऐसे सुरक्षा कवच का निर्माण कर पाएगी जो इस अचूक रफ़्तार को मात दे सके, या फिर हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ युद्ध का फैसला केवल कुछ सेकंड में हो जाएगा?
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