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90 हजार डिग्री सेल्सियस। यह वह खौफनाक तापमान है जो हिरोशिमा में पल भर में पैदा हुआ था, जिसने इंसानों को सीधे भाप में बदल दिया। अगर आज ऐसा कोई परमाणु संकट आपके सिर पर आ जाए, तो घबराने के बजाय सिर्फ एक मूलमंत्र याद रखें—'ब्लाइंडिंग फ्लैश' देखते ही तुरंत जमीन पर पेट के बल लेट जाएं, अपना मुंह ढकें और किसी कंक्रीट की मजबूत इमारत के सबसे अंदरूनी हिस्से (बेसमेंट) में पनाह लें। वक्त गंवाना यानी मौत को दावत देना है।
परमाणु हथियारों का उद्भव और वैश्विक विभीषिका की शुरुआत
इंसानियत के इतिहास में विज्ञान का इससे भयावह दुरुपयोग कभी नहीं हुआ। बात साल 1939 की है, जब अल्बर्ट आइंस्टीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट को एक पत्र लिखकर आगाह किया था कि नाजी जर्मनी एक अत्यंत विनाशकारी नया बम बना सकता है। इसी डर ने जन्म दिया 'मैनहट्टन प्रोजेक्ट' को, जिसके वैज्ञानिक अगुआ जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर थे। न्यू मेक्सिको के रेगिस्तान में जब 16 जुलाई 1945 को पहला सफल परीक्षण (ट्रिनिटी टेस्ट) हुआ, तो दुनिया ने विनाश का नया चेहरा देखा। ओपेनहाइमर के मुंह से तब गीता का श्लोक निकला था—"अब मैं काल बन गया हूँ, लोकों का नाश करने वाला।" इसके ठीक एक महीने बाद, अगस्त 1945 में जापान के दो खूबसूरत शहर, हिरोशिमा और नागासाकी, राख के ढेर में तब्दील कर दिए गए। शीतयुद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शुरू हुई यह परमाणु अंधी दौड़ आज नौ देशों तक फैल चुकी है। आज के आधुनिक थर्मोन्यूक्लियर हथियार उस शुरुआती 'लिटिल बॉय' बम से हजारों गुना अधिक संहारक हैं, जो मानवता के वजूद पर एक निरंतर लटकती तलवार की तरह हैं।
नाभिकीय विस्फोट की चरणबद्ध प्रक्रिया: आखिर होता क्या है उस एक सेकंड में?
जब एक परमाणु बम फटता है, तो तबाही का एक ऐसा दुष्चक्र शुरू होता है जिसकी कल्पना भी सामान्य मस्तिष्क के लिए कठिन है। सबसे पहले माइक्रोसेकंड्स के भीतर 'न्यूक्लियर फिशन' या 'फ्यूजन' के कारण भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है, जिससे सूरज से भी चमकदार एक आग का गोला (फायरबॉल) बनता है। इसके बाद सिलसिलेवार तरीके से विनाश आगे बढ़ता है:
फ्लैश और तीव्र तापीय विकिरण (Thermal Radiation): धमाका होते ही सबसे पहले एक अंधा कर देने वाली रोशनी और भयानक गर्मी निकलती है। यह प्रकाश की गति से चलती है, इसलिए मीलों दूर बैठे लोगों की त्वचा को तुरंत झुलसा देती है और आंखों की रोशनी छीन लेती है।
शॉकवेव और ब्लास्ट प्रेशर (Blast Wave): आग के गोले के ठीक पीछे हवा का एक प्रचंड दबाव (शॉकवेव) पैदा होता है। यह सुपरसोनिक गति से आगे बढ़ता है, जिससे कंक्रीट की इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढह जाती हैं और फेफड़े फटने जैसी आंतरिक चोटें आती हैं।
आयनकारी विकिरण (Prompt Radiation): विस्फोट के शुरुआती एक मिनट में गामा किरणें और न्यूट्रॉन्स का अदृश्य सैलाब छूटता है, जो मानव कोशिकाओं के डीएनए को सीधे नष्ट कर देता है।
मशरूम क्लाउड और फॉलआउट (Fallout): मलबे और धुएं का एक विशाल गुबार आसमान में उठता है। इस गुबार में मौजूद रेडियोधर्मी कण हवा के साथ बहकर मीलों दूर तक जमीन पर बरसने लगते हैं, जिसे 'फॉलआउट' कहते हैं। यही बाद में कैंसर और रेडिएशन सिकनेस का कारण बनता है।
हिरोशिमा का सबक: सुतोमु यामागुची की चमत्कारिक उत्तरजीविता की गाथा
परमाणु हमले के बीच जिंदा कैसे बचा जाए, इसका सबसे जीवंत और प्रामाणिक उदाहरण सुतोमु यामागुची नामक जापानी नागरिक की कहानी है। 6 अगस्त 1945 को यामागुची एक बिजनेस ट्रिप पर हिरोशिमा में थे, तभी वहां पहला परमाणु बम गिरा। वे ग्राउंड जीरो से महज तीन किलोमीटर दूर थे। धमाके की चमक देखते ही उन्होंने तुरंत जमीन पर लेटकर अपनी आंखें और कान बंद कर लिए। हालांकि वे गंभीर रूप से झुलस गए थे, लेकिन इस त्वरित प्रतिक्रिया के कारण उनकी जान बच गई। अगले दिन, वे किसी तरह अपने गृह नगर नागासाकी लौटे। 9 अगस्त को जब वे अपने दफ्तर में सहकर्मियों को हिरोशिमा की तबाही का मंजर सुना रहे थे, ठीक उसी वक्त नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिरा। इस बार भी उन्होंने अपनी सूझबूझ से तुरंत कवर लिया और दोबारा चमत्कारिक रूप से जीवित बच गए। यामागुची ने साबित किया कि परमाणु विस्फोट के केंद्र के पास होने के बावजूद, अगर सही तकनीक और तुरंत फैसले लेने की क्षमता हो, तो मौत के मुंह से भी बाहर निकला जा सकता है। वे 93 वर्ष की आयु तक जीवित रहे।
विशेषज्ञों की क्या राय है?
परमाणु हमले की स्थिति में जीवित बचने के लिए वैज्ञानिक और रक्षा विशेषज्ञ 'डक एंड कवर' (झुकें और ढकें) और 'गेट इनसाइड, स्टे इनसाइड, स्टे ट्यून्ड' (अंदर जाएं, अंदर रहें, जुड़े रहें) की रणनीति को सबसे कारगर मानते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, विस्फोट के तुरंत बाद निकलने वाली तीव्र रोशनी की तरफ देखने से बचें, क्योंकि यह आपको अंधा कर सकती है। यदि आप किसी इमारत के अंदर हैं, तो खिड़कियों से दूर रहें क्योंकि शॉकवेव के कारण शीशे घातक हथियारों में बदल सकते हैं। परमाणु विकिरण (रेडिएशन) से बचने के लिए कंक्रीट या ईंटों से बनी मोटी दीवारें सबसे बेहतरीन सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि धमाके के बाद कम से कम 24 से 48 घंटे तक बेसमेंट या सुरक्षित स्थान के अंदर ही बिताना चाहिए, क्योंकि इस दौरान रेडियोधर्मी फॉलआउट (Fallout) का असर सबसे खतरनाक और जानलेवा स्तर पर होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
क्या परमाणु हमले के बाद मिलने वाला भोजन और पानी सुरक्षित होता है?
परमाणु विस्फोट के बाद खुले में रखा हुआ कोई भी खाद्य पदार्थ या पानी पूरी तरह से दूषित और जहरीला हो जाता है, जिसका सेवन तुरंत मौत या गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है। हालांकि, सील बंद डिब्बे, पैकेट में बंद खाना और रेफ्रिजरेटर या पेंट्री के अंदर रखी चीजें खाने के लिए सुरक्षित होती हैं क्योंकि वे बाहरी हवा और धूल के संपर्क में नहीं आती हैं। पानी के लिए भी केवल बोतलबंद पानी या आपके घर के अंदर के बंद टैंक के पानी का ही उपयोग करें। किसी भी भोजन को खाने से पहले उसके बर्तन या पैकेट को गीले कपड़े से अच्छी तरह साफ कर लें ताकि उस पर जमी रेडियोधर्मी धूल साफ हो सके।
क्या हम साधारण कपड़ों से परमाणु रेडिएशन को रोक सकते हैं?
साधारण कपड़े परमाणु विस्फोट से निकलने वाली शुरुआती और बेहद शक्तिशाली गामा किरणों (Gamma Rays) को रोकने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। हालांकि, ये कपड़े आपके शरीर की त्वचा को रेडियोधर्मी धूल के कणों (Alpha and Beta particles) के सीधे संपर्क में आने से बचाते हैं। यदि आप विस्फोट के समय बाहर थे, तो विशेषज्ञों की सलाह है कि सुरक्षित स्थान पर पहुंचते ही अपने कपड़ों को तुरंत उतार दें और उन्हें एक प्लास्टिक बैग में बंद कर दें। ऐसा करने से आपके शरीर पर मौजूद लगभग 90 प्रतिशत रेडियोधर्मी संदूषण दूर हो जाता है। इसके बाद बिना त्वचा को रगड़े, हल्के गुनगुने पानी और साबुन से अच्छी तरह स्नान करें।
एक विचारणीय प्रश्न
यदि आज के इस आधुनिक और परमाणु हथियारों से लैस युग में मानवता किसी ऐसी वैश्विक आपदा का सामना करती है, तो क्या हमारी तकनीक और विज्ञान हमें सचमुच बचा पाएंगे, या फिर इंसानी वजूद का भविष्य पूरी तरह से सिर्फ हमारे आपसी संयम और शांतिपूर्ण फैसलों पर ही टिका हुआ है?
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