विषय-सूची
- 1. द्विपक्षीय संबंधों का ऐतिहासिक आधार और व्यापारिक पृष्ठभूमि
- 2. आयात की पूरी प्रक्रिया: समुद्र के रास्ते भारत तक माल पहुंचने का चरणबद्ध जरिया
- 3. कच्चे तेल का आयात: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक व्यावहारिक केस स्टडी
- 4. विशेषज्ञों की राय
- 5. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- 6. क्या भारत वैश्विक राजनीतिक दबावों के बावजूद रूस के साथ अपने आर्थिक और ऊर्जा संबंधों को और अधिक मजबूत कर पाएगा?
दुनिया की भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत और रूस का व्यापार रिकॉर्ड 65 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है। इस भारी-भरकम व्यापारिक लेन-देन में रूस का पलड़ा बेहद भारी है, क्योंकि भारत अपनी जरूरतों का बहुत बड़ा हिस्सा वहां से खरीदता है। सीधा जवाब यह है कि रूस से भारत में सबसे ज्यादा कच्चा तेल, रासायनिक खाद (उर्वरक), रक्षा तंत्र के कलपुर्जे, कीमती धातुएं और सूरजमुखी तेल आता है।
द्विपक्षीय संबंधों का ऐतिहासिक आधार और व्यापारिक पृष्ठभूमि
भारत और सोवियत संघ के बीच आर्थिक संबंधों की नींव 1950 के दशक में रखी गई थी। उस दौर में जब पश्चिमी देश भारत को उन्नत तकनीक और भारी मशीनरी देने में हिचकिचा रहे थे, तब रूस ने भारत के भिलाई और बोकारो में स्टील प्लांट लगाने में सीधी मदद की थी। शीत युद्ध के समय से चला आ रहा यह संबंध केवल कूटनीतिक नहीं था, बल्कि यह 'रुपया-रूबल' व्यापार व्यवस्था पर आधारित था, जिससे भारत अपनी मूल्यवान विदेशी मुद्रा बचा पाता था।
1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद कुछ सालों तक व्यापार की गति धीमी रही, लेकिन रक्षा और परमाणु ऊर्जा में सहयोग लगातार बना रहा। तमिलनाडु का कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र रूस के प्राविधिक सहयोग का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है। 2022 के वैश्विक परिदृश्य के बाद व्यापार का पूरा ढांचा ही बदल गया। जब पश्चिमी देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तो रूस ने भारत को रियायती दरों पर कच्चा तेल देना शुरू किया। इसके बाद दोनों देशों का व्यापार पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर एक नए मुकाम पर पहुंच गया, जिसमें मुख्य ध्यान ऊर्जा सुरक्षा पर केंद्रित हो गया।
आयात की पूरी प्रक्रिया: समुद्र के रास्ते भारत तक माल पहुंचने का चरणबद्ध जरिया
रूस से भारत तक सामान की डिलीवरी होना एक बेहद जटिल और रणनीतिक लॉजिस्टिक्स प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे मुख्य रूप से चार प्रमुख चरणों में समझा जा सकता है:
पहला चरण: ऑर्डर और मुद्रा का भुगतान। भारतीय तेल कंपनियां या उर्वरक आयातक रूसी आपूर्तिकर्ताओं के साथ दीर्घकालिक या स्पॉट समझौते करते हैं। अमेरिकी डॉलर पर प्रतिबंधों के कारण अब ज्यादातर लेनदेन भारतीय रुपये, संयुक्त अरब अमीरात के दिरहम या चीनी युआन में विशेष वोस्ट्रो खातों (Vostro Accounts) के जरिए पूरे किए जाते हैं।
दूसरा चरण: रूसी बंदरगाहों पर लदान। रूस के सुदूर पूर्व में स्थित व्लादिवोस्तोक या काला सागर में स्थित नोवोरोस्सियस्क (Novorossiysk) बंदरगाहों पर विशाल टैंकरों और मालवाहक जहाजों में कच्चा तेल, एनपीके खाद या धातुएं लोड की जाती हैं।
तीसरा चरण: समुद्री मार्ग और परिवहन। अधिकांश समुद्री जहाज स्वेज नहर या बाबा-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के रास्ते अरब सागर होते हुए भारत के पश्चिमी तट की ओर बढ़ते हैं। उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के जरिए भी ईरान के रास्ते माल लाने के रास्तों पर काम चल रहा है।
चौथा चरण: भारतीय टर्मिनलों पर उतराई और शोधन। गुजरात के जामनगर, वाडिनार या ओडिशा के पारादीप बंदरगाह पर टैंकर पहुंचते हैं। यहां कच्चे तेल को सीधे रिफाइनरी में भेजा जाता है, जहां से पेट्रोल और डीजल बनाकर पूरे देश में आपूर्ति की जाती है।
कच्चे तेल का आयात: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक व्यावहारिक केस स्टडी
2021 तक भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी महज 1 से 2 प्रतिशत हुआ करती थी। लेकिन इसके बाद परिदृश्य पूरी तरह बदल गया और रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बन गया। भारत ने अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और देश में महंगाई पर काबू पाने के लिए रूसी रियायती तेल का बड़े पैमाने पर आयात किया।
इस केस स्टडी का एक व्यावहारिक पक्ष भारतीय रिफाइनरियों का तकनीकी सामर्थ्य है। भारत की रिलायंस और नायरा जैसी निजी रिफाइनरियों के साथ-साथ इंडियन ऑयल जैसी सरकारी कंपनियों के पास 'सोवियत-ग्रेड' के भारी और सल्फरी यूराल क्रूड (Urals Crude) को प्रोसेस करने की क्षमता है। भारत ने न केवल इस सस्ते कच्चे तेल को प्रोसेस करके देश के भीतर पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर रखा, बल्कि इससे बने परिष्कृत ईंधन को यूरोपीय और एशियाई बाजारों में निर्यात करके विदेशी मुद्रा भी कमाई। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से सस्ते क्रूड के इस आयात ने भारत के चालू खाता घाटे (CAD) को संतुलित रखने में सबसे अहम भूमिका निभाई है।
विशेषज्ञों की राय
आर्थिक और सामरिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और रूस का व्यापारिक रिश्ता अब केवल पारंपरिक रक्षा समझौतों तक सीमित नहीं रह गया है। ऊर्जा क्षेत्र में भारत की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने में रूस एक केंद्रीय भूमिका निभा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा सहारा साबित हुआ है, जिससे देश को घरेलू स्तर पर मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने में काफी मदद मिली है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक इस बात पर भी जोर देते हैं कि भारत को अपने व्यापारिक संतुलन और भुगतान प्रणालियों में विविधता लाने की आवश्यकता है। रूबल-रुपया भुगतान तंत्र जैसी पहलों के बावजूद, लॉजिस्टिक्स और वैश्विक प्रतिबंधों से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भविष्य में उर्वरक, परमाणु ऊर्जा और रक्षा स्पेयर पार्ट्स के अलावा तकनीक और दुर्लभ खनिजों के क्षेत्र में साझेदारी बढ़ाना दोनों देशों के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ का सौदा होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. रूस से भारत सबसे अधिक मात्रा में किस चीज़ का आयात करता है?
वर्तमान समय में भारत रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल (Crude Oil) आयात करता है। इसके अलावा, भारत रूस से भारी मात्रा में रासायनिक उर्वरक (Fertilizers), सैन्य उपकरण और उनके स्पेयर पार्ट्स, कच्चे हीरे, तथा औद्योगिक धातुएं भी खरीदता है। ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से ये आयात भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
2. रूस-भारत व्यापार में भुगतान की क्या व्यवस्था अपनाई जा रही है?
वैश्विक बैंकिंग प्रतिबंधों के कारण दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार के लिए रुपया-रूबल भुगतान तंत्र और अन्य वैकल्पिक करेंसी चैनलों का उपयोग बढ़ाया है। हालांकि, व्यापार का पलड़ा रूस के पक्ष में अधिक झुका होने के कारण भारतीय बैंकों में जमा रुपये का उपयोग करने के लिए भारत में रूसी निवेश और नए वित्तीय विकल्पों पर लगातार काम किया जा रहा है।
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