भारत चीन से सबसे ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक सामान और इंडस्ट्रियल कंपोनेंट्स आयात करता है। इसमें स्मार्टफोन के पार्ट्स, सेमीकंडक्टर चिप्स, सर्किट बोर्ड, एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) और भारी मशीनरी शामिल हैं। दरअसल, सतह पर देखने पर लगता है कि हम खिलौने या उपभोक्ता उत्पाद खरीद रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि भारतीय विनिर्माण (manufacturing) और दवा उद्योग की रीढ़ चीनी कच्चे माल पर टिकी हुई है। भारत अपने देश में चीजें बनाने के लिए भी चीन से पुर्जे मंगवाने को मजबूर है, जिसके चलते द्विपक्षीय व्यापार घाटा लगातार बढ़ता ही जा रहा है।

आंकड़ों की जुबानी: आयात की भयावह तस्वीर और निर्भरता

व्यापारिक आंकड़ों को देखें तो स्थिति काफी चौंकाने वाली लगती है। भारत के कुल इलेक्ट्रॉनिक्स आयात का एक बड़ा हिस्सा सीधे चीन से आता है। देश में बनने वाली दवाओं के लिए जरूरी 70% से ज्यादा API (सक्रिय दवा घटक) चीनी बाजारों से ही खरीदे जाते हैं। सोलर पैनल और लिथियम-आयन बैटरी के मामले में तो यह निर्भरता 80 से 90 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।

विगत वर्षों के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि भारत चीन से सालाना लगभग 100 अरब डॉलर से अधिक का आयात कर रहा है, जबकि भारत का निर्यात इसका एक छोटा सा हिस्सा ही है। यह असंतुलन दिखाता है कि भारतीय उद्योग चीनी सप्लाई चेन पर कितने गहराई से निर्भर हैं।

आयात के मुख्य विकल्प और रणनीतिक रणनीतियां: क्या है रास्ता?

चीनी आयात पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के पास मुख्य रूप से तीन बड़े रास्ते बचते हैं:

पहला रास्ता (स्वदेशी उत्पादन - PLI स्कीम): भारत सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना शुरू की है। इसका मकसद देश के भीतर ही इलेक्ट्रॉनिक्स और दवाओं के पुर्जों का निर्माण बढ़ाना है, ताकि चीन से खरीद बंद की जा सके।

दूसरा रास्ता (चाइना प्लस वन नीति): भारतीय कंपनियां अब वियतनाम, ताइवान, दक्षिण कोरिया और मलेशिया जैसे वैकल्पिक देशों से पुर्जे मंगवाने की कोशिश कर रही हैं। इससे जोखिम किसी एक देश पर केंद्रित नहीं रहता।

तीसरा रास्ता (कच्चे माल का घरेलू शोधन): दुर्लभ खनिजों और रसायनों की प्रोसेसिंग के लिए देश में ही बुनियादी ढांचा खड़ा करना, ताकि असेंबलिंग के साथ-साथ बेसिक कंपोनेंट भी खुद बनाए जा सकें।

एक चेतावनी: अचानक निर्भरता घटाने के गंभीर खतरे

चीन से आयात को रातों-रात बंद या बहुत कम कर देना भारत के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। अगर हम बिना किसी ठोस विकल्प के आयात पर सख्त प्रतिबंध लगाते हैं, तो भारत के घरेलू उद्योग ठप पड़ सकते हैं।

उदाहरण के लिए, यदि चीनी API का आयात रुकता है, तो भारत का प्रसिद्ध जीवन रक्षक दवा उद्योग पूरी तरह चरमरा जाएगा। इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबलिंग इकाइयां बंद हो जाएंगी और लाखों नौकरियों पर खतरा मंडराने लगेगा। चीन पर निर्भरता खत्म करने का कदम भावनात्मक नहीं बल्कि बेहद रणनीतिक और क्रमिक होना चाहिए, वरना भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।

एक ऐसा अनसुना तथ्य जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं

जब हम चीन से आयात की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान खिलौनों, मोबाइल फोन और दिवाली की लाइटों जैसी उपभोक्ता वस्तुओं पर ही जाता है। लेकिन एक कड़वा और अनसुना तथ्य यह है कि भारत चीन से सबसे ज्यादा उन चीजों का आयात करता है जो हमारे अपने उद्योगों को चलाने के लिए कच्चे माल (Raw Materials) के रूप में काम आती हैं। उदाहरण के लिए, हमारे देश के फार्मास्यूटिकल्स यानी दवा उद्योग को ही ले लीजिए। भारत को दुनिया का 'फार्मेसी' कहा जाता है,