भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार वित्त वर्ष 2024-25 में $68.7 अरब (लगभग 68.7 बिलियन डॉलर) के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच चुका है। 2021 तक यह आंकड़ा महज 13 अरब डॉलर के आसपास सिमटा हुआ था। लेकिन हालिया वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बाद भारत द्वारा रूस से रिकॉर्ड मात्रा में रियायती कच्चे तेल की खरीदारी ने इन आंकड़ों को रातों-रात बदल दिया। अब दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक व्यापार को 100 अरब डॉलर के पार ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है।

द्विपक्षीय व्यापार के मुख्य आंकड़े और ताजा स्थिति

आंकड़ों को बारीकी से देखें तो पता चलता है कि दोनों देशों के बीच व्यापार की गति अभूतपूर्व रही है। कुल व्यापार में सबसे बड़ा हिस्सा आयात का है। भारत द्वारा रूस से किया जाने वाला आयात करीब 66.4 अरब डॉलर के आसपास है। इसमें अकेले कच्चे तेल की हिस्सेदारी 52 अरब डॉलर से अधिक है। इसके अलावा भारत बड़े पैमाने पर रूसी उर्वरक, कोयला और कीमती धातुएं भी खरीद रहा है।

दूसरी ओर, भारत से रूस को होने वाला निर्यात अभी भी तुलनात्मक रूप से काफी कम है। भारत रूस को लगभग 4.84 अरब डॉलर का सामान ही भेज पाता है। इसमें मुख्य रूप से दवाएं (फार्मास्युटिकल्स), इलेक्ट्रॉनिक सामान, कंप्यूटर हार्डवेयर, मशीनरी और चाय शामिल हैं। व्यापार का पलड़ा पूरी तरह से रूस के पक्ष में झुका हुआ है, जिससे भारत का व्यापार घाटा 61 अरब डॉलर के पार चला गया है।

भुगतान के रास्ते: रुपए-रुबल और वैकल्पिक प्रणालियों की तुलना

पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के बाद व्यापार जारी रखना कोई आसान काम नहीं था। भारत और रूस ने कारोबार निपटाने के लिए तीन मुख्य रास्ते अपनाए। पहला रास्ता रुपए-रुबल तंत्र (Vostro Accounts) का था। इस व्यवस्था में भारतीय बैंक रूसी बैंकों के विशेष वोस्ट्रो खाते खोलते हैं ताकि घरेलू मुद्रा में लेनदेन हो सके। लेकिन भारतीय निर्यात कम होने के कारण रूसी बैंकों के पास अरबों रुपए जमा हो गए, जिनका वे इस्तेमाल नहीं कर पाए।

दूसरा तरीका यूएई दिरहम या चीनी युआन जैसी तीसरी देश की मुद्राओं में भुगतान करना रहा। इसने तात्कालिक राहत तो दी, लेकिन विनिमय दर के उतार-चढ़ाव ने लागत बढ़ा दी। तीसरा और सबसे नया रुख राष्ट्रीय मुद्राओं में सीधे व्यापार और डिजिटल भुगतान संदेश प्रणालियों को जोड़ना है। जब तक भारतीय निर्यात नहीं बढ़ता, केवल मुद्रा बदलना पूरी समस्या का हल नहीं बनता।

व्यापार संतुलन का बड़ा जोखिम और भविष्य की चुनौतियां

व्यापार का यह भारी असंतुलन भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि भारत रूस को अपनी वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात नहीं बढ़ा पाता, तो यह एकतरफा निर्भरता लंबे समय तक नहीं टिक सकती। पश्चिमी देशों का सेकेंडरी प्रतिबंधों का खतरा हमेशा मंडराता रहता है, जिससे भारतीय जहाजरानी और बीमा कंपनियों को काम करने में हिचकिचाहट होती है।

इसके अलावा, लाल सागर संकट और लंबी समुद्री दूरी के कारण लॉजिस्टिक्स की लागत लगातार बढ़ रही है। अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) और चेन्नै-व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग को पूरी तरह सक्रिय किए बिना माल ढुलाई का खर्च कम करना नामुमकिन जैसा है। अगर दोनों देश इन लॉजिस्टिक्स बाधाओं और बैंकिंग रुकावटों को समय रहते नहीं सुलझाते, तो 100 अरब डॉलर का लक्ष्य हासिल करना कागजों तक ही सीमित रह सकता है।

एक अनदेखा पहलू जिस पर कम ही लोग ध्यान देते हैं

भारत और रूस के द्विपक्षीय व्यापार की जब भी चर्चा होती है, तो ध्यान अक्सर कच्चे तेल और रक्षा सौदों पर ही केंद्रित रहता है। लेकिन अधिकांश लोग एक महत्वपूर्ण तथ्य को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, और वह है गैर-ऊर्जा व्यापार का विस्तार। रूस अब भारत से केवल तेल आपूर्ति करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि भारतीय कृषि उत्पादों, फार्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए एक बड़ा बाजार बन रहा है। इसके अलावा, दोनों देश राष्ट्रीय मुद्राओं (रुपया-रूबल) में भुगतान प्रणाली को मजबूत कर रहे हैं। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद विकसित यह वैकल्पिक तंत्र न केवल अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करता है, बल्कि भारतीय निर्यातकों के लिए नए व्यापारिक रास्ते भी खोलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भारत और रूस के बीच मुख्य रूप से किन वस्तुओं का व्यापार होता है?

भारत मुख्य रूप से रूस से कच्चा तेल, उर्वरक और रक्षा उपकरण आयात करता है, जबकि भारत रूस को दवाएं, चाय, कॉफी और मशीनरी निर्यात करता है।

2. व्यापार संतुलन किस देश के पक्ष में है?

हाल के वर्षों में व्यापार संतुलन अत्यधिक रूस के पक्ष में झुका हुआ है, जिसका मुख्य कारण भारत द्वारा भारी मात्रा में रूसी तेल का आयात है।

3. रुपया-रूबल भुगतान प्रणाली क्या है?

यह एक ऐसा तंत्र है जिसके तहत दोनों देश डॉलर के बजाय अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापारिक भुगतान करते हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों का असर कम होता है।

4. भविष्य में इस व्यापार की क्या संभावनाएं हैं?

उत्तरी-दक्षिणी परिवहन गलियारे (INSTC) और नए व्यापारिक समझौतों के चलते आने वाले समय में द्विपक्षीय व्यापार में और वृद्धि की प्रबल संभावना है।

निष्कर्ष और हमारा दृष्टिकोण

भारत-रूस व्यापार संबंध केवल ऊर्जा सुरक्षा तक सीमित नहीं रहने चाहिए। भारत को अपने व्यापार घाटे को कम करने के लिए रूस को किए जाने वाले निर्यात को तेजी से बढ़ाना होगा। वैश्विक भू-राजनीतिक दबावों के बावजूद, भारत को अपनी आर्थिक संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। रूस के साथ एक संतुलित, रणनीतिक और बहुआयामी व्यापारिक साझेदारी ही भविष्य में भारत की आर्थिक स्थिरता को मजबूत आधार प्रदान करेगी।