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पिछले एक दशक में भारत की सैन्य रणनीति और रक्षा खरीद प्रक्रिया में भारी उलटफेर हुआ है। मोदी सरकार ने 2014 से 2026 के बीच अपने रक्षा बजट को ₹2.53 लाख करोड़ से बढ़ाकर ऐतिहासिक ₹7.85 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया है। इस दौरान भारत ने फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान और रूस से S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसे विशाल विदेशी रक्षा समझौते किए। हालांकि, सबसे बड़ा बदलाव यह रहा कि आधुनिकीकरण बजट का 75% हिस्सा केवल भारतीय रक्षा कंपनियों के लिए आरक्षित कर दिया गया, जिससे घरेलू रक्षा उत्पादन ₹1.78 लाख करोड़ पार कर गया।
रक्षा बजट, सौदे और खरीद के प्रमुख आंकड़े
मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया में भारी पूंजी निवेश देखा गया है। वर्ष 2024-25 में ही रक्षा मंत्रालय ने कुल ₹2.09 लाख करोड़ मूल्य के रिकॉर्ड 193 अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए। इनमें से 177 अनुबंध, जिनकी कीमत लगभग ₹1.68 लाख करोड़ थी, सीधे घरेलू उद्योगों को दिए गए।
रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) द्वारा पिछले कुछ वर्षों में ₹10 लाख करोड़ से अधिक के सौदों को प्रारंभिक मंजूरी (AoN) दी जा चुकी है। प्रमुख घरेलू सौदों में ₹62,000 करोड़ के 97 स्वदेशी तेजस Mk-1A फाइटर जेट और ₹62,700 करोड़ के 156 प्रचंड लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर शामिल हैं। 2025-26 के रक्षा पूंजीगत बजट में ₹1.80 लाख करोड़ केवल नए हथियारों, जहाजों और सैन्य उपकरणों की खरीद के लिए आवंटित किए गए।
आयात बनाम स्वदेशीकरण: रणनीति की तुलना
भारतीय सेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सरकार ने दो अलग-अलग रास्तों को अपनाया है—विदेशी आपातकालीन खरीद और लंबी अवधि का स्वदेशी निर्माण। दोनों तरीकों की तुलना नीचे समझी जा सकती है:
विदेशी आयात और आपातकालीन खरीद: त्वरित परिचालन तत्परता के लिए फ्रांस से राफेल (समुद्री संस्करण सहित 26 अतिरिक्त जेट) और रूस से S-400 वायु रक्षा प्रणाली की सीधी खरीद की गई। यह तरीका तुरंत आधुनिक तकनीक प्रदान करता है, लेकिन विदेशी मुद्रा पर भारी बोझ डालता है।
आत्मनिर्भर भारत और 'बाय इंडियन' मॉडल: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP 2020) के तहत 5,000 से अधिक सैन्य मदों के आयात पर चरणबद्ध प्रतिबंध लगाया गया। अब कुल रक्षा खरीद का 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा भारतीय एमएसएमई और सार्वजनिक उपक्रमों से खरीदा जा रहा है। हालांकि इसमें समय अधिक लगता है, लेकिन यह भारत के रणनीतिक हितों को सुरक्षित करता है।
चेतावनी के बिंदु — खरीद प्रक्रिया में संभावित जोखिम
बड़े पैमाने पर हथियार खरीदने और नीतियां बदलने के साथ कई तरह की प्रशासनिक और रणनीतिक चुनौतियां भी खड़ी होती हैं। अगर इन पर ध्यान न दिया जाए, तो सैन्य तैयारी प्रभावित हो सकती है:
नौकरशाही की देरी: रक्षा अधिग्रहण परिषद से मंजूरी (AoN) मिलने और वास्तविक अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के बीच अक्सर वर्षों का समय बीत जाता है।
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में बाधाएं: विदेशी कंपनियां अक्सर भारत को महत्वपूर्ण और संवेदनशील तकनीक (ToT) सौंपने से कतराती हैं, जिससे मरम्मत के लिए विदेशी निर्भरता बनी रहती है।
गुणवत्ता नियंत्रण और उत्पादन क्षमता: घरेलू निजी और सरकारी रक्षा इकाइयों द्वारा समय पर आपूर्ति न कर पाने से भारतीय वायु सेना के बेड़े में फाइटर स्क्वाड्रन की कमी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
एक कम जाना-माना तथ्य जिसे अधिकतर लोग नज़रअंदाज़ कर देते हैं
अक्सर रक्षा खरीद की चर्चा केवल फ्रांस से राफेल फाइटर जेट या रूस से S-400 वायु रक्षा प्रणाली जैसे बड़े विदेशी सौदों तक सीमित रह जाती है। लेकिन इसका सबसे कम चर्चित और महत्वपूर्ण पहलू रक्षा बजट का 'पूंजीगत आवंटन का स्वदेशीकरण' है।
मोदी सरकार ने एक नीतिगत बदलाव करते हुए रक्षा पूंजी खरीद बजट का 75% से अधिक हिस्सा केवल भारतीय घरेलू उद्योग के लिए आरक्षित कर दिया है। इसके अलावा, रक्षा मंत्रालय ने 5,000 से अधिक सैन्य उपकरणों की 'सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची' जारी की है, जिनका विदेशों से आयात पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसका नतीजा यह हुआ कि भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड ऊंचाई को छू रहा है और भारत सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि 100 से अधिक देशों को रक्षा प्रणालियों का निर्यात करने वाला प्रमुख देश बन चुका है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत की सबसे बड़ी रक्षा डील कौन सी रही है?
फ्रांस के साथ 36 राफेल लड़ाकू विमानों का अंतर-सरकारी सौदा (लगभग ₹59,000 करोड़) और रूस के साथ S-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली का सौदा सरकार के सबसे प्रमुख विदेशी रक्षा अधिग्रहणों में शामिल हैं। इसके साथ ही स्वदेशी एलसीए तेजस (Mk-1A) के बड़े ऑर्डर भी महत्वपूर्ण रहे हैं।
2. क्या आयात पर भारत की निर्भरता कम हुई है?
हां, 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' पहलों के तहत भारतीय सशस्त्र बलों की प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है। अब अधिकांश पूंजीगत खरीद स्वीकृतियां (AoN) घरेलू उद्योग से आपूर्ति के लिए दी जा रही हैं।
3. रक्षा खरीद का कितना बजट घरेलू कंपनियों को दिया जाता है?
वर्तमान नीतियों के अनुसार, रक्षा पूंजीगत खरीद बजट का लगभग तीन-चौथाई (75%) हिस्सा घरेलू रक्षा निर्माताओं, एमएसएमई (MSME) और स्टार्ट-अप्स के लिए निर्धारित किया गया है।
4. क्या भारत रक्षा उपकरणों का निर्यात भी कर रहा है?
बिल्कुल। भारत का रक्षा निर्यात पिछले दशक के दौरान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है। भारत अब पिनाका रॉकेट सिस्टम, ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल और आकाश एयर डिफेंस सिस्टम जैसे हथियारों का निर्यात आर्मेनिया, फिलीपींस और अन्य मित्र देशों को कर रहा है।
निष्कर्ष और हमारा दृष्टिकोण
मोदी सरकार की रक्षा खरीद रणनीति केवल विदेशी हथियारों को बेड़े में शामिल करने तक सीमित नहीं रही है, बल्कि रणनीतिक स्वतंत्रता हासिल करने पर केंद्रित है। जहां एक तरफ आपातकालीन खरीद के जरिए आधुनिक तकनीक तुरंत हासिल की गई, वहीं दूसरी तरफ घरेलू रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया गया। भारत को दो मोर्चों की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी सैन्य क्षमताओं को लगातार आधुनिक बनाने के साथ-साथ पूर्ण आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ना होगा। यही राष्ट्रीय सुरक्षा का एकमात्र टिकाऊ रास्ता है।
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