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पाकिस्तान में इस समय खुले दूध की कीमत औसतन 180 से 220 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर के बीच चल रही है, जबकि पैकेटबंद दूध के दाम इससे भी काफी अधिक यानी 250 से 280 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच चुके हैं। देश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, आसमान छूती महंगाई और मुद्रास्फीति ने आम जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। दूध जैसी बुनियादी खाद्य वस्तु का महंगा होना केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह हर घर के बजट पर सीधा प्रहार है। इस संकट के पीछे ईंधन के बढ़ते दाम, आयातित चारे की भारी किल्लत और लगातार गिरती पाकिस्तानी रुपये की कीमत जैसे कई गंभीर कारण सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं जो स्थिति को बद से बदतर बना रहे हैं।
पाकिस्तान में डेयरी सेक्टर के मुख्य आंकड़े और आर्थिक संकट की असल तस्वीर
दूध उत्पादन के मामले में पाकिस्तान दुनिया के शीर्ष देशों में शुमार है, जहां सालाना करोड़ों लीटर दूध का उत्पादन होता है। इसके बावजूद, देश के प्रमुख शहरों जैसे कराची, लाहौर और रावलपिंडी में उपभोक्ताओं को लगातार आसमान छूती कीमतों का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी आंकड़ों और डेयरी एसोसिएशन की रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में पशुओं के चारे की लागत में लगभग 60 से 70 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा, परिवहन खर्च बढ़ने और ईंधन के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने से ग्रामीण इलाकों से शहरों तक दूध पहुंचाने का खर्च भी कई गुना बढ़ गया है। पंजाब और सिंध प्रांत जो देश के मुख्य दुग्ध उत्पादक क्षेत्र हैं, वहां भी डेयरी किसानों को मुनाफा कमाने के बजाय अपनी लागत निकालने में भारी संघर्ष करना पड़ रहा है। यही वजह है कि थोक और खुदरा बाजार के बीच कीमतों का यह बड़ा अंतर आम जनता की कमर तोड़ रहा है।
खुला दूध बनाम पैकेटबंद दूध: विकल्प और बाजार की बदलती हुई वास्तविकरीतियाँ
बाजार में उपभोक्ताओं के पास मुख्य रूप से दो ही विकल्प बचते हैं - पहला स्थानीय गोपालकों और ग्वलियों से मिलने वाला खुला दूध और दूसरा बड़ी कंपनियों द्वारा प्रोसेस किया गया पैकेटबंद दूध। खुले दूध की सबसे बड़ी खूबी उसकी पारंपरिक ताज़गी और कम कीमत होती है, लेकिन इसमें मिलावट का खतरा हमेशा बहुत अधिक बना रहता है। दूसरी तरफ, पैकेटबंद दूध सुरक्षा और स्वच्छता के मानकों पर बेहतर खरा उतरता है, मगर इसकी ऊंची कीमतें मध्यम और गरीब वर्ग की पहुंच से कोसों दूर हैं। शहरी इलाकों में रहने वाले लोग अक्सर स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पैकेटबंद दूध को प्राथमिकता देते हैं, जबकि ग्रामीण और अर्ध-शहरी आबादी आज भी अपनी आर्थिक मजबूरी के चलते खुले दूध पर ही निर्भर रहने को विवश है। डेयरी उद्योग से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि सरकार ने समय रहते उत्पादन लागत को कम करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले दिनों में दूध का यह विकल्प भी एक दुर्लभ विलासिता बन जाएगा।
बढ़ती कीमतों और मिलावट का खतरनाक दौर: क्या हो सकती है इसके भयानक परिणाम
दूध की कीमतों में बेलगाम बढ़ोतरी और प्रशासनिक नियंत्रण की कमी का सबसे खतरनाक परिणाम मिलावट के बढ़ते अवैध कारोबार के रूप में सामने आ रहा है। मुनाफाखोर डेयरी संचालक अपने घटते मुनाफे को बनाए रखने के लिए दूध में पानी, यूरिया, स्टार्च और डिटर्जेंट जैसे जहरीले रसायनों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं। इस तरह के दूषित और मिलावटी दूध का सेवन करने से छोटे बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, जिससे गंभीर बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। यदि समय रहते खाद्य सुरक्षा विभाग और संबंधित नियामकों ने इस पर लगाम नहीं कसी, तो यह स्थिति समाज में एक बहुत बड़े स्वास्थ्य संकट को जन्म दे सकती है।
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