विषय-सूची
- 1. मनमोहन सरकार के कार्यकाल के दौरान कर्ज और राजकोषीय घाटे के प्रमुख आंकड़े
- 2. आर्थिक नीतियों और वित्तीय प्रबंधन के विभिन्न दृष्टिकोणों की तुलना
- 3. एक चेतावनी भरा दृष्टिकोण — वित्तीय कुप्रबंधन और नीतिगत जोखिम
- 4. एक ऐसा अनसुना पहलू जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं
- 5. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
- 6. निष्कर्ष और हमारी राय
डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल (2004 से 2014) के दौरान भारत पर कुल सरकारी कर्ज मार्च 2014 तक बढ़कर लगभग 55 से 58 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। जब यूपीए सरकार ने 2004 में सत्ता संभाली थी, तब सकल कर्ज जीडीपी का लगभग 67 प्रतिशत था, जो 2014 में घटकर लगभग 53 प्रतिशत के आसपास आ गया। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि इस अवधि में कर्ज का पूर्ण आंकड़ा तो बढ़ा, लेकिन देश की जीडीपी में तेज बढ़ोतरी के कारण कर्ज और जीडीपी का अनुपात सुधरा। इस दौर में वैश्विक मंदी और तेल की बढ़ती कीमतों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने एक निश्चित स्थिरता बनाए रखी थी।
मनमोहन सरकार के कार्यकाल के दौरान कर्ज और राजकोषीय घाटे के प्रमुख आंकड़े
वित्तीय वर्ष 2004 में जब यूपीए गठबंधन सत्ता में आया, तब केंद्र सरकार का कुल सार्वजनिक ऋण (Public Debt) लगभग 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक था, जो लगातार बढ़ते हुए मार्च 2014 के अंत तक लगभग 58.67 लाख करोड़ रुपये (लगभग 53% से 55% जीडीपी अनुपात) तक पहुंच गया। इसके अलावा, इस कार्यकाल में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए बड़े पैमाने पर ऑयल बॉन्ड (Oil Bonds) जारी किए गए, जिनकी कुल राशि करीब 1.48 लाख करोड़ रुपये थी। राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) जो 2007-08 में नियंत्रण में था, 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी के बाद आर्थिक प्रोत्साहन पैकेजों की वजह से बढ़कर जीडीपी के 6 प्रतिशत से भी ऊपर चला गया था। कुल मिलाकर निरपेक्ष (Absolute) आंकड़ों में कर्ज बढ़ा, लेकिन जीडीपी की विकास दर अधिक होने के कारण अनुपात नियंत्रित रहा।
आर्थिक नीतियों और वित्तीय प्रबंधन के विभिन्न दृष्टिकोणों की तुलना
मनमोहन सिंह के शासनकाल में अपनाई गई आर्थिक रणनीतियों और बाद के दशकों की नीतियों में बुनियादी अंतर देखने को मिलता है। एक तरफ जहां यूपीए सरकार ने ग्रामीण विकास, समावेशी वृद्धि और सामाजिक कल्याण योजनाओं (जैसे मनरेगा) पर जोर दिया, जिसके कारण राजकोषीय घाटे पर दबाव बढ़ा; वहीं दूसरी तरफ बाजार की चाल को खुला रखने और निजी निवेश को प्रोत्साहित करने की नीति अपनाई गई। इसके विपरीत, बाद के दौर में पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) और अधोसंरचना पर सीधे खर्च को बढ़ाने का मार्ग चुना गया, जिससे कर्ज के पूर्ण आंकड़ों में तीव्र वृद्धि दर्ज की गई। अर्थशास्त्रियों के बीच यह बहस हमेशा से प्रासंगिक रही है कि क्या कल्याणकारी योजनाओं के लिए ऋण लेना बेहतर है या फिर प्रत्यक्ष बुनियादी ढांचे के विकास के लिए कर्ज बढ़ाना अधिक प्रभावी है।
एक चेतावनी भरा दृष्टिकोण — वित्तीय कुप्रबंधन और नीतिगत जोखिम
किसी भी सरकार के कार्यकाल में ऋण का बढ़ जाना अपने आप में संकट का संकेत नहीं होता, बशर्ते उसका उपयोग उत्पादक संपत्तियों के निर्माण में हो। हालांकि, यदि राजकोषीय अनुशासन की अनदेखी की जाए और अनुत्पादक सब्सिडियों या अंतरराष्ट्रीय झटकों के कारण ऋण चुकाने की क्षमता प्रभावित हो, तो अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरे उत्पन्न हो सकते हैं। मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल (2009-2014) के अंतिम वर्षों में 'पॉलिसी पैरालिसिस' (नीतिगत पक्षाघात), बढ़ते नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) और उच्च मुद्रास्फीति (Inflation) ने वित्तीय साख पर दबाव डाला। यदि समय रहते इन संरचनात्मक कमियों को दूर न किया जाए, तो मुद्रा का मूल्य गिर सकता है और विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है, जिससे देश गंभीर ऋण संकट की स्थिति में फंस सकता है।
एक ऐसा अनसुना पहलू जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं
मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान कुल सरकारी कर्ज के आंकड़ों को देखते समय अक्सर उस सूक्ष्म आर्थिक पृष्ठभूमि को अनदेखा कर दिया जाता है, जिसके तहत नीतियां बनाई गई थीं। एक कम चर्चित तथ्य यह है कि उस दौर में वैश्विक वित्तीय संकट (2008) के बावजूद भारतीय बैंकिंग प्रणाली और राजकोषीय घाटे को संभालने के लिए भारी घरेलू और विदेशी उधारी का सहारा लेना पड़ा था। हालांकि ऋण के पूर्ण आंकड़े बड़े दिखते हैं, लेकिन जीडीपी के अनुपात के रूप में विश्लेषण करने पर यह समझ आता है कि विकास दर को बनाए रखने के लिए सार्वजनिक निवेश कितना महत्वपूर्ण था। आलोचक अक्सर उस समय के नीतिगत फैसलों और राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेजों पर सवाल उठाते हैं, लेकिन यह भी सच है कि डॉ. मनमोहन सिंह और उनकी आर्थिक टीम ने संकट के उन वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक मंदी के गहरे प्रभावों से बचाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की थी। इस प्रकार, केवल कर्ज के निरपेक्ष अंकों को देखने के बजाय, उस कर्ज के उपयोग और उसके दीर्घकालिक प्रभावों को समझना अधिक प्रासंगिक है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न 1: मनमोहन सरकार के दौरान भारत का कुल सरकारी कर्ज कितना था?
उत्तर: वर्ष 2014 में मनमोहन सरकार के कार्यकाल की समाप्ति पर भारत का कुल सार्वजनिक ऋण (आंतरिक और बाहरी दोनों मिलाकर) लगभग 55 लाख करोड़ रुपये के आसपास था, जो उस समय के जीडीपी का लगभग 45 से 48 प्रतिशत हिस्सा था।
प्रश्न 2: क्या मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कर्ज में भारी बढ़ोतरी हुई थी?
उत्तर: हाँ, निरपेक्ष आंकड़ों (Absolute Numbers) के लिहाज से कर्ज में वृद्धि हुई थी, जो कि किसी भी बढ़ती हुई विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए स्वाभाविक है, क्योंकि बुनियादी ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं के वित्तपोषण के लिए उधारी आवश्यक होती है।
प्रश्न 3: क्या 2008 की वैश्विक मंदी का कर्ज बढ़ने पर असर पड़ा था?
उत्तर: बिल्कुल, 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से निपटने के लिए सरकार को आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज देने पड़े थे, जिसके कारण राजकोषीय घाटा बढ़ा और तदनुरूप सरकारी उधारी में भी उछाल आया।
प्रश्न 4: क्या जीडीपी के मुकाबले कर्ज की स्थिति नियंत्रण में थी?
उत्तर: हाँ, यद्यपि कर्ज की कुल राशि बढ़ी थी, लेकिन भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि (GDP Growth) के कारण ऋण-से-जीडीपी अनुपात एक सुरक्षित और प्रबंधनीय दायरे में ही बना रहा था।
निष्कर्ष और हमारी राय
आर्थिक इतिहास का मूल्यांकन करते समय केवल राजनीतिक आरोपों या केवल बड़े आंकड़ों के आधार पर राय बनाना न्यायसंगत नहीं है। मनमोहन सरकार के दौरान लिया गया कर्ज विकास की गति को तेज करने और वैश्विक आर्थिक झटकों से देश को महफूज रखने का एक अनिवार्य हिस्सा था। हमारी स्पष्ट राय यह है कि किसी भी सरकार के कर्ज का सही आकलन केवल उसके कुल आकार से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि उस कर्ज का उपयोग देश की उत्पादक क्षमता, बुनियादी ढांचे और गरीबों के कल्याण के लिए कितनी कुशलता से किया गया। समझदारी इसी में है कि हम हर आर्थिक निर्णय को उसके समय और परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में देखें।
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