वैश्विक वित्तीय गलियारों में जब भी सबसे बड़े कर्जदार का जिक्र होता है, तो आंकड़े आसमान छूते नजर आते हैं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक महासम्राट पर वर्तमान में लगभग 40 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक का सार्वजनिक कर्ज मंडरा रहा है? इस गंभीर वैश्विक सवाल का सीधा और अकाट्य उत्तर संयुक्त राज्य अमेरिका है, जो कुल ऋण के मामले में पूरी दुनिया में सबसे आगे है। हालांकि, जब बात जीडीपी के अनुपात की आती है, तो जापान जैसे देश भी इस दौड़ में कड़ा मुकाबला देते दिखाई देते हैं।

राष्ट्रीय ऋण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसका विस्तार

सार्वजनिक ऋण का यह जाल कोई रातोंरात तैयार नहीं हुआ है, बल्कि इसकी जड़ें सदियों पुरानी वित्तीय नीतियों में समाहित हैं। यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो शुरुआती दौर में राष्ट्रों ने अपनी आंतरिक जरूरतों और युद्धकालीन खर्चों को पूरा करने के लिए स्थानीय स्तर पर बॉन्ड जारी करना शुरू किया था। आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के उदय के साथ, विशेषकर बीसवीं सदी के विश्व युद्धों और मंदी के दौर में, सरकारों को भारी भरकम बजट घाटे का सामना करना पड़ा। इस वित्तीय असंतुलन से निपटने के लिए सरकारों ने खजाने की तिजोरियों को भरने हेतु बड़े पैमाने पर विदेशी और घरेलू ऋणों का सहारा लेना अनिवार्य माना। धीरे-धीरे यह उधार लेने की प्रवृत्ति सरकारों की नियमित राजकोषीय नीति का एक अभिन्न हिस्सा बन गई, जिससे वैश्विक ऋण का यह विशालकाय ढांचा धीरे-धीरे मजबूत होता चला गया।

सरकारी उधारी की यह पूरी प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से कैसे काम करती है

यह पूरा तंत्र अत्यंत जटिल वित्तीय प्रक्रियाओं और संस्थागत व्यवस्थाओं के इर्द-गिर्द घूमता है। सबसे पहले, कोई भी सरकार अपने वार्षिक बजट में राजस्व और व्यय के बीच के भारी अंतर यानी राजकोषीय घाटे की घोषणा करती है। इस वित्तीय खाई को पाटने के लिए केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय मिलकर ट्रेजरी बॉन्ड, सिक्योरिटीज और गिल्ट-एज्ड इंस्ट्रूमेंट्स जारी करते हैं। घरेलू निवेशक, विदेशी संस्थाएं और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान इन सरकारी प्रस्तावों को खरीदते हैं, जिसके बदले सरकार को तुरंत नकद राशि प्राप्त होती है। इस प्रकार जुटाई गई धनराशि का उपयोग बुनियादी ढांचे के विकास, सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं और रक्षा बजट को पोषित करने में किया जाता है। चक्र पूरा तब होता है जब सरकार को निवेशकों को एक निश्चित समय सीमा के भीतर मूलधन के साथ भारी ब्याज का भुगतान करना पड़ता है, जिसके लिए अक्सर नए ऋण लेने की आवश्यकता आन पड़ती है।

संयुक्त राज्य अमेरिका का वित्तीय परिदृश्य: एक विस्तृत लघु केस स्टडी

इस पूरी परिघटना को अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आईने में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जो दुनिया के सबसे बड़े ऋण धारक का जीवंत उदाहरण है। अमेरिकी संघीय सरकार का कुल राष्ट्रीय ऋण अब लगभग 40.7 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है, जो कई प्रमुख यूरोपीय देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्थाओं से भी अधिक है। इतने विशालकाय कर्ज के बावजूद, अमेरिकी डॉलर की वैश्विक आरक्षित मुद्रा की स्थिति और ट्रेजरी बॉन्ड पर निवेशकों का अटूट भरोसा इस अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रखता है। वाशिंगटन अक्सर बजट गतिरोध और ऋण सीमा बढ़ाने के राजनीतिक संघर्षों से जूझता है, फिर भी वैश्विक वित्तीय बाजार अमेरिकी संपत्तियों को सबसे सुरक्षित निवेश के रूप में मान्यता देते हैं। यह विशिष्ट उदाहरण दर्शाता है कि कैसे एक राष्ट्र अत्यधिक ऋण के बोझ तले दबा होने के बावजूद अपनी भू-राजनीतिक और आर्थिक ताकत के बल पर वैश्विक वित्तीय प्रणाली का केंद्र बना रह सकता है।

What experts say about it

अर्थशास्त्रियों और वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि किसी देश पर अत्यधिक कर्ज होना हमेशा पूरी तरह नकारात्मक नहीं होता है, बशर्ते उस ऋण का उपयोग देश के बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और उत्पादक क्षेत्रों में किया जाए। कई बड़े अर्थशास्त्री यह तर्क देते हैं कि अमेरिका और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के पास अपने कर्ज को प्रबंधित करने के लिए विशाल आर्थिक क्षमता और मजबूत राजस्व स्रोत होते हैं। हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि यदि ऋण का स्तर अनियंत्रित रूप से बढ़ता जाए और देश की जीडीपी की तुलना में यह अनुपात बहुत अधिक हो जाए, तो इससे भविष्य में वित्तीय संकट, मुद्रास्फीति और ब्याज दरों में भारी बढ़ोतरी का खतरा पैदा हो जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, कर्ज चुकाने की क्षमता और घरेलू निवेशकों का विश्वास ही किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मुख्य भूमिका निभाता है।

Frequently Asked Questions

क्या किसी देश का दिवालिया होना संभव है?

हाँ, इतिहास में कई ऐसे देश रहे हैं जो अपने विदेशी कर्जों का भुगतान करने में असमर्थ रहे हैं और उन्हें आर्थिक रूप से दिवालिया घोषित किया गया है, जिसे 'सॉवरन डिफॉल्ट' कहा जाता है। जब कोई देश अपने ऋणों पर ब्याज या मूलधन चुकाने से चूक जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी साख गिर जाती है, जिससे उसे आगे कर्ज मिलने में भारी मुश्किलें आती हैं और उस देश की मुद्रा का मूल्य भी तेजी से नीचे गिरने लगता है।

क्या कर्ज का बोझ आम नागरिक की जेब को प्रभावित करता है?

प्रत्यक्ष रूप से भले ही यह सरकारी ऋण लगे, लेकिन इसका असर देश के आम नागरिक की दैनिक जीवनशैली पर अवश्य पड़ता है। जब सरकारों पर भारी कर्ज का बोझ होता है, तो वे अपने वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए करों (taxes) में वृद्धि करती हैं, सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च कम करती हैं और महंगाई बढ़ जाती है, जिससे अंततः नागरिकों की क्रय शक्ति प्रभावित होती है।

जब पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था ही उधार की नींव पर टिकी हो, तो क्या आने वाले समय में एक नया वैश्विक वित्तीय संकट अपरिहार्य है?