विषय-सूची
- 1. राज्यों की इस वित्तीय बेबसी की जड़ें और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- 2. यह आर्थिक चक्र कैसे काम करता है: उधारी से दिवालियापन तक की पूरी प्रक्रिया
- 3. एक जमीनी हकीकत: पंजाब का वित्तीय संकट और बिगड़ती तस्वीर
- 4. What experts say about it
- 5. Frequently Asked Questions
- 6. End with a provocative open question to the reader
क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि देश के कुछ राज्य अपनी कमाई से कई गुना ज्यादा उधारी के दलदल में धंस चुके हैं? यह वित्तीय संकट किसी अदृश्य आंधी की तरह भारतीय अर्थव्यवस्था को अंदर से खोखला कर रहा है। सरल शब्दों में कहें तो, भारत के कई राज्यों पर कुल मिलाकर करोड़ों-अरबों रुपये का भारी-भरकम कर्ज बकाया है, जो हर गुजरते साल के साथ विकराल रूप धारण करता जा रहा है।
राज्यों की इस वित्तीय बेबसी की जड़ें और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
आजादी के बाद से ही भारतीय संघ ढांचे में राज्यों के पास अपने खर्च चलाने के लिए सीमित वित्तीय स्रोत रहे हैं। केंद्र सरकार से मिलने वाले करों के हिस्से और अपने खुद के कर संग्रह से जब राज्यों की ज़रूरतें पूरी नहीं होतीं, तो वे राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए खुले बाजार से उधारी लेने लगते हैं। नब्बे के दशक के आर्थिक उदारीकरण के बाद से इसमें तेजी आई। कल्याणकारी योजनाओं की अंधाधुंध घोषणाओं, मुफ्त की रेवड़ियों की संस्कृति और अनुत्पादक खर्चों ने राज्यों की तिजोरियों को खाली करना शुरू कर दिया। कोविड-19 महामारी के दौरान जब कर राजस्व बुरी तरह गिरा, तब राज्यों ने अपनी अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने के लिए अंधाधुंध ऋण लिए, जिससे यह समस्या एक गंभीर मोड़ पर पहुंच गई।
यह आर्थिक चक्र कैसे काम करता है: उधारी से दिवालियापन तक की पूरी प्रक्रिया
राज्यों द्वारा कर्ज लेने और उसे चुकाने का यह पूरा तंत्र एक जटिल वित्तीय चक्र पर आधारित है। सबसे पहले, राज्य सरकारें अपने बजट में भारी घाटा दर्ज करती हैं क्योंकि उनके खर्चे उनकी आय से कहीं अधिक होते हैं। इस अंतर को मिटाने के लिए, वे भारतीय रिजर्व बैंक के माध्यम से सरकारी प्रतिभूतियां जारी करती हैं और बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों से बाजार ऋण उठाती हैं। दूसरा चरण तब शुरू होता है जब पुरानी उधारी और उसके भारी ब्याज को चुकाने के लिए राज्यों को नए सिरे से और बड़े कर्ज लेने पड़ते हैं। इस तरह वे 'ऋण जाल' में फंस जाते हैं। तीसरा और सबसे खतरनाक चरण तब आता है जब कर्ज की यह भारी किस्त विकास कार्यों के लिए मिलने वाले बजट को निगल जाती है। नतीजतन, बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कट जाता है, और राज्य केवल ब्याज चुकाने के लिए ही कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं।
एक जमीनी हकीकत: पंजाब का वित्तीय संकट और बिगड़ती तस्वीर
इस संकट की भयावाहता को समझने के लिए पंजाब का उदाहरण सबसे सटीक बैठता है। कृषि प्रधान राज्य होने के बावजूद, पंजाब आज देश के सबसे ज्यादा कर्ज के बोझ तले दबे राज्यों में शुमार है। दशकों से मुफ्त बिजली, अंधाधुंध सब्सिडी और कुप्रबंधन ने राज्य के राजकोष को तंगहाल कर दिया है। स्थिति यह है कि पंजाब को अपनी कुल राजस्व आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्जों के ब्याज चुकाने में ही खर्च करना पड़ता है। परिणामस्वरूप, नई सड़कों का निर्माण रुक गया है, सरकारी स्कूलों की हालत खस्ता है और उद्योगों का पलायन तेजी से हुआ है। यह केस स्टडी साफ दर्शाती है कि कैसे अदूरदर्शी नीतियां एक संपन्न राज्य को भी वित्तीय बदहाली के कगार पर ला खड़ा कर सकती हैं।
What experts say about it
अर्थशास्त्रियों और वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यों पर बढ़ता हुआ कर्ज सीधे तौर पर उनकी राजकोषीय सेहत के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब राज्य सरकारों की कुल कमाई का एक बड़ा हिस्सा केवल पुराने ऋणों के ब्याज भुगतान में खर्च होने लगता है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसी विकासत्मक परियोजनाओं के लिए पर्याप्त बजट नहीं बच पाता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रिपोर्टों में भी इस बात की बार-बार चेतावनी दी गई है कि मुफ्त की योजनाओं और लोकलुभावन घोषणाओं के लिए अनियंत्रित रूप से कर्ज लेना राज्यों को दीर्घकालिक आर्थिक संकट में धकेल सकता है। कुछ राज्यों का कर्ज-से-जीडीपी अनुपात तय सीमा से काफी ऊपर पहुंच चुका है, जिसके कारण वित्तीय अनुशासन बनाए रखना और दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों को हासिल करना और अधिक कठिन होता जा रहा है।
Frequently Asked Questions
क्या सभी राज्यों पर कर्ज होना हमेशा एक बुरा संकेत माना जाता है?
नहीं, यदि राज्य सरकार द्वारा लिया गया कर्ज नई सड़कों, अस्पतालों, सिंचाई परियोजनाओं और उद्योगों जैसी पूंजीगत परिसंपत्तियों (Capital Assets) के निर्माण में लगाया जाता है, तो यह भविष्य में आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देता है। इसे एक उत्पादक ऋण माना जाता है, जिससे राज्य की आय बढ़ती है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब कर्ज का उपयोग केवल वेतन, पेंशन और प्रशासनिक खर्चों या मुफ्त बांटी जाने वाली सब्सिडी जैसी गैर-उत्पादक दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है।
राज्यों के लिए कर्ज की कोई सुरक्षित सीमा या नियम तय किए गए हैं?
हां, भारत में राज्यों के वित्तीय प्रबंधन को नियंत्रित करने के लिए राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम बनाए गए हैं। इसके तहत हर राज्य के लिए उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के मुकाबले कर्ज और राजकोषीय घाटे की एक निश्चित अधिकतम सीमा तय की जाती है ताकि वे वित्तीय रूप से अनुशासित रहें और दिवालियापन के जोखिम से बचे रहें।
End with a provocative open question to the reader
जब राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए मुफ्त घोषणाओं के वादे करते हैं और अंततः उसका वित्तीय बोझ राज्य के हर आम नागरिक पर कर्ज के रूप में पड़ता है, तो क्या लोकतंत्र में जनता को यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि विकास के नाम पर उनकी आने वाली पीढ़ियों को कर्जदार क्यों बनाया जाए?
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