क्या आप जानते हैं कि दक्षिण भारत में मुरुगन या सुब्रह्मण्य के रूप में पूजे जाने वाले भगवान कार्तिकेय की उत्तर भारत के कई प्रमुख हिस्सों में मुख्य तौर पर पूजा क्यों नहीं की जाती? सनातन ग्रंथों के अनुसार यह विरोधाभास एक शाप और उनकी विशेष ब्रह्मचारी प्रकृति से जुड़ा है। उत्तर भारत के अधिकांश परिवारों में उनकी मूर्ति स्थापना वर्जित मानी जाती है, जिसके पीछे पौराणिक कथाओं के कई गहरे और रोचक कारण छिपे हुए हैं।

भगवान कार्तिकेय का दिव्य प्रादुर्भाव और देवसेनापति पद की कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कार्तिकेय भगवान शिव और माता पार्वती के प्रथम पुत्र हैं। उनका जन्म देवताओं की रक्षा और तारकासुर नामक महाशक्तिशाली राक्षस का वध करने के लिए हुआ था। जब तारकासुर के अत्याचारों से तीनों लोक त्राहि-त्राहि कर उठे, तब देवताओं ने भगवान शिव की योगनिद्रा को भंग कर उनसे संतान उत्पत्ति की प्रार्थना की। अग्नि देव, गंगा और क्रत्तिकाओं द्वारा लालन-पालन होने के कारण कार्तिकेय के छह मुख प्रकट हुए और वे बाल्यकाल में ही देव सेना के सेनापति बन गए। उन्होंने मात्र सात दिन की आयु में ही तारकासुर का वध करके ब्रह्मांड को उसके आतंक से मुक्त कराया।

माता के शाप का प्रभाव और उत्तर भारत में पूजा का निषेध

कार्तिकेय की पूजा न होने के मुख्य कारणों में एक प्रसिद्ध पौराणिक प्रसंग जुड़ा हुआ है। एक बार माता पार्वती और भगवान शिव अपने दोनों पुत्रों—गणेश और कार्तिकेय की परीक्षा ले रहे थे। उन्होंने कहा कि जो संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा सबसे पहले करके लौटेगा, वही श्रेष्ठ कहलाएगा। कार्तिकेय अपने मयूर पर सवार होकर तुरंत ब्रह्मांड की परिक्रमा के लिए निकल पड़े, जबकि चतुर गणेश जी ने अपने माता-पिता के ही चक्कर लगाकर उनकी परिक्रमा पूरी कर ली। जब कार्तिकेय लौटकर आए और उन्होंने गणेश को विजेता घोषित होते देखा, तो वे अत्यंत रुष्ट हो गए और उन्होंने क्षोभ में आकर अपने शरीर का मांस और रक्त अपनी माता को अर्पित कर दिया। इस अप्रिय और क्रोधी कृत्य से आहत होकर माता पार्वती ने उन्हें शाप दिया कि जो भी स्त्री उत्तर भारत में उनके बाल रूप के दर्शन करेगी या उनकी नियमित पूजा करेगी, उसका वैवाहिक जीवन और संतान सुख संकट में पड़ जाएगा। यही कारण है कि उत्तर भारत में गृहस्थ लोग उनकी मूर्ति घर में स्थापित करने से बचते हैं।

दक्षिण भारत का उलट परिदृश्य और मुरुगन की व्यापक उपासना

इसके विपरीत, यदि हम दक्षिण भारत की यात्रा करें तो परिदृश्य बिल्कुल बदला हुआ दिखाई देता है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में कार्तिकेय को 'भगवान मुरुगन', 'सुब्रह्मण्य' और 'तमिझ़क कड़वुल' यानी तमिलों के प्रधान देवता के रूप में पूजा जाता है। वहां 'थाई पूसम' और 'षष्ठी' जैसे पर्वों पर लाखों भक्त उनकी आराधना करते हैं और उनके 'वेल' (भाले) की पूजा पूरे विधि-विधान से की जाती है। दक्षिण भारत में यह मान्यता है कि कार्तिकेय ज्ञान, शौर्य और मोक्ष के दाता हैं, इसलिए वहां उनका पूजन अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। इस प्रकार भूगोल के आधार पर एक ही देवता की उपासना के नियम और मान्यताएं पूरी तरह बदल जाती हैं।