नेपाल के इतिहास के पन्नों को पलटें तो राजशाही का अंत और लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना दक्षिण एशिया के राजनीतिक परिदृश्य में एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ रहा है। सदियों पुरानी इस राजशाही व्यवस्था के अंतिम राजा ज्ञानेंद्र वीर विक्रम शाह देव (King Gyanendra Bir Bikram Shah Dev) थे। उनके शासनकाल के साथ ही नेपाल में शाह वंश के सैकड़ों वर्षों के राजसी आधिपत्य का अंत हो गया और देश एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य में परिवर्तित हो गया।

इस लेख के पहले भाग में हम नेपाल के अंतिम राजा के परिचय, उनके सत्ता में आने की पृष्ठभूमि और उन असाधारण परिस्थितियों का विस्तार से अध्ययन करेंगे, जिनके कारण नेपाल की राजनीति में भूचाल आया था।

नेपाल के अंतिम राजा: ज्ञानेंद्र वीर विक्रम शाह देव कौन हैं?

ज्ञानेंद्र वीर विक्रम शाह देव का जन्म 7 जुलाई 1947 को काठमांडू के नारायणहिटी राजमहल में हुआ था। वे नेपाल के इतिहास में एक ऐसे शासक रहे हैं जिन्हें दो अलग-अलग अवधियों में देश का राजा बनने का अवसर मिला। उनका पहला कार्यकाल बेहद संक्षिप्त (1950-1951) था, जब उनके दादा राजा त्रिभुवन के परिवार के साथ भारत चले जाने पर बच्चों के रूप में उन्हें अस्थायी रूप से गद्दी पर बैठाया गया था।

हालांकि, उनकी मुख्य और चर्चित भूमिका उनके दूसरे कार्यकाल (2001 से 2008) के दौरान रही, जो नेपाल के आधुनिक राजनीतिक इतिहास का सबसे उथल-पुथल भरा दौर साबित हुआ।

राजशाही के पतन की पृष्ठभूमि और शाही हत्याकांड

नेपाल में राजशाही के अंत की कहानी सीधे तौर पर जून 2001 के कुख्यात नारायणहिटी शाही परिवार हत्याकांड से जुड़ी हुई है। इस दर्दनाक घटना में तत्कालीन लोकप्रिय राजा वीरेंद्र बीर बिक्रम शाह (ज्ञानेंद्र के बड़े भाई), रानी ऐश्वर्या और शाही परिवार के कई अन्य सदस्य मारे गए।

  • पारिवारिक त्रासदी: आधिकारिक जाँच के अनुसार, युवराज दीपेंद्र ने इस नरसंहार को अंजाम दिया और बाद में आत्महत्या कर ली।

  • सत्ता परिवर्तन: इस अप्रत्याशित और खौफनाक त्रासदी के बाद, देश में शोक और संशय के माहौल के बीच 4 जून 2001 को ज्ञानेंद्र शाह को नेपाल का नया राजा घोषित किया गया।

शुरुआत में नेपाली जनता ने नए राजा से काफी उम्मीदें लगाई थीं कि वे देश में शांति और स्थिरता कायम करेंगे, विशेषकर तब जब देश पहले से ही माओवादी insurgency (विद्रोह) की समस्या से जूझ रहा था।

राजनीतिक संकट और राजा का प्रत्यक्ष शासन

राजा बनते ही ज्ञानेंद्र शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश में बढ़ रहे माओवादी विद्रोह को कुचलने और राजनीतिक दलों के बीच तालमेल बिठाने की थी। लेकिन आने वाले वर्षों में राजा और संसद के बीच दूरियां बढ़ती चली गईं:

  1. संसद का निलंबन: राजनीतिक अस्थिरता और सरकारों के बार-बार गिरने से क्षुब्ध होकर, राजा ज्ञानेंद्र ने फरवरी 2005 में देश की चुनी हुई संसद को भंग कर दिया और कार्यकारी शक्तियां अपने हाथों में लेते हुए प्रत्यक्ष शासन (Absolute Monarchy) लागू कर दिया।

  2. जनता का आक्रोश: राजा द्वारा सत्ता अपने हाथ में लेने के कदम को लोकतंत्र प्रेमियों और राजनीतिक दलों ने तानाशाही करार दिया। इसके खिलाफ नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और अन्य दलों ने मिलकर राजा के खिलाफ कड़ा मोर्चा खोल दिया।

इस प्रकार, राजा ज्ञानेंद्र के कठोर प्रशासनिक निर्णयों ने उस जन-आंदोलन की नींव रख दी, जिसने आगे चलकर नेपाल से हमेशा के लिए राजशाही की जड़ों को हिला कर रख दिया।

(यह लेख का पहला भाग है। अगले भाग में हम जानेंगे कि कैसे जन-आंदोलन 2006 के बाद नेपाल में राजशाही का पूरी तरह से पतन हुआ और देश गणराज्य बना।)

नेपाल में राजशाही का पतन और राजा ज्ञानेंद्र की विदाई

वर्ष 2001 में हुए हृदय विदारक नारायणहिटी राजदरबार नरसंहार के बाद जब ज्ञानेन्द्र वीर विक्रम शाह देव ने नेपाल की गद्दी संभाली, तब देश पहले ही एक गहरे मानसिक और राजनीतिक आघात से गुजर रहा था। उनके पूर्ववर्ती और बड़े भाई राजा वीरेंद्र की लोकप्रिय छवि के विपरीत, राजा ज्ञानेंद्र के सत्ता संभालने के बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता और तेजी से बढ़ने लगी।

लोकतांत्रिक आंदोलन और राजतंत्र की समाप्ति

ज्ञानेन्द्र शाह के शासनकाल के दौरान नेपाल में माओवादी विद्रोह अपने चरम पर था। देश की बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और राजनीतिक दलों के साथ बढ़ते तनाव के बीच, राजा ज्ञानेंद्र ने फरवरी 2005 में प्रत्यक्ष शासन अपने हाथ में ले लिया और तमाम कार्यकारी शक्तियां अपने नियंत्रण में कर लीं। इस कदम ने नेपाल की जनता और राजनीतिक दलों को उनके खिलाफ एकजुट कर दिया।

परिणामस्वरूप, सात राजनीतिक दलों के गठबंधन और माओवादियों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसने नेपाल में एक बड़े जन-आंदोलन (लोकआंदोलन-II) को जन्म दिया। इस व्यापक जनाक्रोश और विरोध प्रदर्शनों के आगे झुकते हुए राजा को अंततः संसद को बहाल करना पड़ा।

एक नए गणराज्य का उदय

मई 2008 में नेपाल में संविधान सभा के चुनाव हुए, जिनमें जनता ने स्पष्ट रूप से राजतंत्र को समाप्त करने का फैसला सुनाया। 28 मई 2008 को अपनी पहली बैठक में ही संविधान सभा ने भारी बहुमत से नेपाल को एक 'संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य' घोषित कर दिया। इसी ऐतिहासिक निर्णय के साथ, पृथ्वी नारायण शाह द्वारा शुरू किए गए शाह वंश के 240 वर्षों से अधिक पुराने राजशाही इतिहास का और नेपाल के अंतिम हिन्दू राष्ट्र होने का अंत हो गया।

राजा ज्ञानेंद्र को बिना किसी बड़े संघर्ष के राजमहल (नारायणहिटी दरबार) खाली करने का आदेश दिया गया, जिसे बाद में एक सार्वजनिक संग्रहालय में बदल दिया गया। इस प्रकार, ज्ञानेंद्र शाह नेपाल के इतिहास के अंतिम नरेश के रूप में दर्ज हो गए, और नेपाल ने आधिकारिक तौर पर आधुनिक लोकतंत्र की नई यात्रा शुरू की।

क्या आप नेपाल के राजनीतिक इतिहास या वहां की वर्तमान शासन प्रणाली के बारे में कुछ और जानना चाहते हैं?