ब्रिटिश काल के बाद से आज तक कभी भी पूरी ईमानदारी से राज्य स्तर पर कोई मुकम्मल गणना नहीं करवाई गई थी, जिससे हर कोई अपने कयास के घोड़े दौड़ाता था। राजनेता अपने पक्ष में हवा बनाने के लिए अलग-अलग आंकड़े उछालते थे। यही वजह थी कि सामाजिक न्याय के नाम पर नीतियों का निर्धारण करना धुंध में तीर चलाने जैसा था। जब आखिरकार राज्य प्रशासन ने बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण का यह बीड़ा उठाया, तो कई दशकों पुरानी दबी-छिपाई हक़ीक़तें सतह पर तैरने लगीं। इस पूरी कवायद ने औपनिवेशिक मानसिकता को तोड़ते हुए जमीनी हकीकत को आईना दिखा दिया, जिससे यह साफ हो गया कि किस तबके की सामाजिक और जनसांख्यिकीय स्थिति वास्तव में क्या है।
दूसरे चरण में, प्रगणक यानी डेटा जुटाने वाले कर्मचारी घर-घर गए और प्रत्येक व्यक्ति से उसकी जाति, उप-जाति, आर्थिक स्थिति और पेशे से जुड़े निर्धारित सवालों के जवाब दर्ज किए। इस दौरान कुल सत्रह प्रकार के बिंदुओं पर जानकारी जुटाई गई ताकि सिर्फ जाति ही नहीं, बल्कि उस जाति की आर्थिक और शैक्षणिक हैसियत का भी कच्चा चिट्ठा हाथ लग सके। जुटाए गए इन तमाम कच्चे आंकड़ों को डिजिटल पोर्टल पर अपलोड किया गया, जहाँ उन्नत सॉफ़्टवेयर और एल्गोरिदम के ज़रिए उनकी कड़े स्तर पर जाँच और मिलान किया गया। अंत में, तमाम विसंगतियों को दूर करते हुए राज्य सरकार ने इन आंकड़ों को सार्वजनिक किया, ताकि नीति निर्माता और शोधकर्ता भविष्य की योजनाओं के लिए इसका वैज्ञानिक इस्तेमाल कर सकें।
अन्य प्रमुख जातियों की स्थिति और सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव
बिहार की जाति आधारित गणना के विस्तृत आंकड़ों के अनुसार, यादव समुदाय के बाद राज्य में अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) और अत्यंत पिछड़ी जातियों (EBC) की भी एक बड़ी आबादी है।
अनुसूचित जातियों (SC) के अंतर्गत दुसाध (पासवान) लगभग 5.31% और रविदास (चमार) करीब 5.25% की आबादी के साथ सबसे बड़े समूहों के रूप में सामने आए हैं।
निष्कर्ष
बिहार में सबसे बड़ी जाति के रूप में यादव समुदाय की उपस्थिति ने राज्य के राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित किया है।
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