बिहार में गरीबी का सच: नीति आयोग के आँकड़ों के आईने में

किसी भी राज्य या क्षेत्र के समग्र विकास का आकलन करने के लिए वहां के जीवन स्तर, आर्थिक स्थिति और गरीबी के आंकड़ों का अध्ययन करना सबसे महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है। भारत के सबसे प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्यों में से एक बिहार लंबे समय से अपनी अनूठी आर्थिक चुनौतियों और विकास दर को लेकर चर्चा के केंद्र में रहा है। जब यह सवाल उठता है कि "बिहार में कितने प्रतिशत लोग गरीब हैं?", तो इसका उत्तर केवल एक साधारण आंकड़े तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी जीवन स्तर से जुड़े कई बहुआयामी पहलू छिपे हैं।

बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) क्या है और यह कैसे काम करता है?

पारंपरिक रूप से गरीबी का आकलन केवल आय या उपभोग के स्तर पर किया जाता था, लेकिन आधुनिक अर्थशास्त्री और नीतिकार इस बात से सहमत हैं कि गरीबी केवल पैसे की कमी नहीं है, बल्कि यह अवसरों और बुनियादी सुविधाओं के आभाव का भी नाम है।

नीति आयोग का बहुआयामी गरीबी सूचकांक मुख्य रूप से तीन प्रमुख आयामों और बारह संकेतकों के आधार पर तैयार किया जाता है:

  • स्वास्थ्य (Health): इसके अंतर्गत पोषण (Nutrition) और बाल-किशोरावस्था मृत्यु दर (Child and Adolescent Mortality) को शामिल किया जाता है।

  • शिक्षा (Education): इसके तहत स्कूली शिक्षा के वर्ष (Years of Schooling) और विद्यालयी उपस्थिति (School Attendance) का आकलन होता है।

  • जीवन स्तर (Standard of Living): इसके अंतर्गत खाना पकाने का ईंधन, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, आवास, बैंक खाते, और संपत्ति जैसे संकेतक आते हैं।

जब कोई परिवार इनमें से एक तिहाई या उससे अधिक संकेतकों में वंचित पाया जाता है, तो उसे बहुआयामी रूप से गरीब माना जाता है।

बिहार में गरीबी का वर्तमान प्रतिशत: क्या कहते हैं आंकड़े?

नीति आयोग की रिपोर्ट (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी NFHS के आंकड़ों पर आधारित) के अनुसार, बिहार में गरीबी के मोर्चे पर पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है, फिर भी यह राज्य देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक गरीबी दर वाला राज्य बना हुआ है:

  • पिछली स्थिति (2015-16): राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़ों के अनुसार, साल 2015-16 में बिहार की कुल आबादी का 51.89 प्रतिशत हिस्सा बहुआयामी रूप से गरीब था। उस समय राज्य की आधी से अधिक आबादी बुनियादी सुविधाओं से वंचित थी।

  • ताजा स्थिति (2019-21): इसके बाद के सर्वेक्षण (NFHS-5) के आधार पर नीति आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट में यह सामने आया कि बिहार में गरीबी का प्रतिशत घटकर 33.76 प्रतिशत पर आ गया है।

महत्वपूर्ण तथ्य: हालांकि बिहार में गरीबी का प्रतिशत अब भी देश के कई अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक है, लेकिन इस अवधि के दौरान लगभग 2.25 से 3 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठने में सफल रहे हैं, जो राज्य में सकारात्मक बदलाव का एक बड़ा संकेत है।

ग्रामीण बनाम शहरी क्षेत्रों में गरीबी की खाई

बिहार के भीतर जब हम ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों का विश्लेषण करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि गरीबी मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में अपनी जड़ें जमाए हुए है:

  • ग्रामीण बिहार: राज्य के गाँवों में आज भी कृषि पर निर्भरता, रोजगार के सीमित अवसरों और बुनियादी संरचना की कमी के कारण गरीबी का प्रतिशत उच्च स्तर पर बना हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में बहुआयामी गरीबी का अनुपात शहरी क्षेत्रों की तुलना में काफी अधिक है।

  • शहरी बिहार: राजधानी पटना और अन्य जिला मुख्यालयों जैसे शहरी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार तक बेहतर पहुंच के कारण गरीबी के प्रतिशत में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।

क्षेत्रीय असमानता: बिहार के सबसे गरीब जिले

बिहार के भीतर भी जिलों के आधार पर गरीबी की स्थिति में भारी अंतर देखने को मिलता है। नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि उत्तर-पूर्वी और कोसी क्षेत्र के कुछ जिलों में गरीबी का प्रतिशत सबसे अधिक है:

  • सर्वाधिक गरीब जिले: किशनगंज, अररिया, मधेपुरा, पूर्वी चंपारण और सुपौल जैसे जिलों में लगभग 60 प्रतिशत से अधिक आबादी बहुआयामी रूप से गरीब दर्ज की गई है। इन क्षेत्रों में बाढ़ की समस्या, कम साक्षरता दर और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी इसके मुख्य कारण रहे हैं।

  • कम गरीब जिले: इसके विपरीत, राजधानी पटना, रोहतास, मुंगेर, और सिवान जैसे जिलों में गरीबी का प्रतिशत राज्य के औसत से काफी कम है, जहां शहरीकरण और शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत बेहतर है।

(लेख का यह पहला भाग बिहार में गरीबी के आधिकारिक आंकड़ों, बहुआयामी पैमानों और भौगोलिक स्थिति को रेखांकित करता है। इसके अगले भाग में हम गरीबी के मुख्य कारणों, सरकार द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं और इससे निपटने की भविष्य की रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।)

सुधार की दिशा और सरकारी प्रयास

बिहार में गरीबी के आंकड़ों में हाल के वर्षों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। नीति आयोग के राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) के अनुसार, राज्य में गरीबी के स्तर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। एक समय जहां बिहार की लगभग 51.89 प्रतिशत आबादी बहुआयामी रूप से गरीब थी, वहीं यह आंकड़ा घटकर लगभग 33.76 प्रतिशत पर आ गया है। इसका मतलब है कि करोड़ों लोगों ने बहुआयामी गरीबी के दायरे से बाहर निकलने में सफलता पाई है।

इस सुधार के पीछे मुख्य कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और बुनियादी जीवन स्तर जैसे पैमानों पर किए गए केंद्रित प्रयास हैं। राज्य और केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं—जैसे ग्रामीण आवास योजना, हर घर नल का जल, और विद्युत कवरेज में विस्तार—ने निचले स्तर पर जीवन की गुणवत्ता को सुधारने में बड़ी भूमिका निभाई है। स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और स्कूली शिक्षा में नामांकन बढ़ने से भी इस दिशा में सकारात्मक परिणाम मिले हैं।

भविष्य की चुनौतियाँ और निष्कर्ष

हालांकि गरीबी के प्रतिशत में कमी आई है, फिर भी यह दर अभी भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच का अंतर तथा कुछ विशेष जिलों में विकास की धीमी गति अभी भी नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।

निष्कर्षतः, बिहार से गरीबी पूरी तरह समाप्त करने के लिए निरंतर और तेज गति से काम करने की आवश्यकता है। इसके लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कदम उठाने जरूरी हैं:

  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार: युवाओं के लिए तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण को बढ़ावा देना ताकि पलायन पर अंकुश लगे।

  • औद्योगीकरण में तेजी: राज्य में नए उद्योगों की स्थापना और निवेश को आकर्षित करना ताकि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हों।

  • कृषि का आधुनिकीकरण: किसानों को आधुनिक तकनीक और बेहतर बाजार उपलब्ध कराकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना।

सतत विकास के इन लक्ष्यों को हासिल करके ही बिहार स्थायी रूप से गरीबी के दर्जे से पूरी तरह उबर सकता है।