अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच यदि किसी देश के साथ भारत की दोस्ती सबसे स्थिर, पुरानी और कसौटी पर खरी उतरी है, तो वह रूस (पूर्ववर्ती सोवियत संघ) है। जब भी भारत के सामने कोई विकट कूटनीतिक, आर्थिक या सैन्य संकट आया, तब-तब मॉस्को ने एक सच्चे मित्र की तरह दिल्ली का हाथ थामा। यह आलेख इसी अनूठी और गहरी साझेदारी के ऐतिहासिक पहलुओं का विश्लेषण करता है।

1. शीत युद्ध का दौर और कूटनीतिक कवच (UN में वीटो पावर)

स्वतंत्रता के तुरंत बाद जब भारत अपनी नींव मजबूत कर रहा था, तब वैश्विक मंचों पर उसे पश्चिमी देशों के भारी दबाव का सामना करना पड़ा। विशेष रूप से कश्मीर के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत के खिलाफ कई बार पश्चिमी देशों द्वारा प्रस्ताव लाए गए।

ऐसे नाजुक मोर्चों पर सोवियत संघ (रूस) ने भारत के लिए एक सुरक्षा कवच का काम किया। रूस ने कई बार अपने वीटो पावर (Veto Power) का इस्तेमाल करके भारत विरोधी प्रस्तावों को निष्प्रभावी कर दिया। इस प्रकार, उसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा में सबसे बड़ी कूटनीतिक ढाल की भूमिका निभाई।

2. 1971 का ऐतिहासिक युद्ध और सोवियत संघ की दो टूक भूमिका

भारत-रूस मित्रता के इतिहास में वर्ष 1971 का स्वर्ण जयन्ती वर्ष मील का पत्थर माना जाता है। जब बांग्लादेश की मुक्ति के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया था, तब अमेरिका और चीन का गठजोड़ पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर सामने आ गया था। अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े को बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना कर दिया गया था ताकि भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके।

उस संकट की घड़ी में अगस्त 1971 में भारत और सोवियत संघ के बीच 'शांति, मित्रता और सहयोग की संधि' (Indo-Soviet Treaty of Peace, Friendship and Cooperation) पर हस्ताक्षर हुए। इस संधि ने स्पष्ट संदेश दे दिया कि यदि भारत पर कोई बाहरी हमला होता है, तो सोवियत संघ चुप नहीं बैठेगा। इसके बाद सोवियत संघ ने हिंद महासागर में अपने नौसैनिक जहाजों को तैनात कर अमेरिकी और चीनी धमकियों को बेअसर कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप भारत को ऐतिहासिक विजय प्राप्त हुई।

3. रक्षा और सैन्य आत्मनिर्भरता की रीढ़

भारत की रक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने में रूस हमेशा से सबसे आगे रहा है। जहां पश्चिमी देश शुरुआती दशकों में भारत को उन्नत सैन्य तकनीक देने से कतराते थे, वहीं रूस ने बिना किसी शर्त के भारत को अपने सबसे घातक हथियार और रक्षा प्रणालियां सौंपीं:

  • हथियार और विमान: भारतीय वायुसेना की रीढ़ माने जाने वाले मिग-21 से लेकर आधुनिक सुखोई Su-30MKI लड़ाकू विमान रूस की ही देन हैं।

  • थल सेना की ताकत: भारतीय थल सेना के मुख्य युद्धक टैंक जैसे T-90 'भीष्म' रूस के साथ गहरे रक्षा सहयोग का प्रमाण हैं।

  • रणनीतिक मिसाइल प्रणाली: आधुनिक युग में वायु रक्षा को अजय बनाने वाली S-400 ट्रायम्फ (Triumf) मिसाइल प्रणाली की आपूर्ति कर रूस ने फिर साबित किया कि वह भारत की सुरक्षा प्राथमिकताओं को सर्वोपरि रखता है।

इसके अलावा, आज के दौर में 'मेक इन इंडिया' (Make in India) के तहत ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल जैसी प्रणालियों का विकास भी इसी मजबूत तकनीकी साझेदारी का परिणाम है, जो भारत की सामरिक ताकत को कई गुना बढ़ाती हैं।

70 Years of Strategic Partnership Explained

यह वीडियो पिछले सात दशकों में भारत और रूस के बीच विकसित हुई उस अटूट रणनीतिक और कूटनीतिक साझेदारी का विस्तार से विश्लेषण करता है, जिसने दोनों देशों के संबंधों को वैश्विक पटल पर एक नई मजबूती दी है।

India-Russia Relations Explained: 70 Years of Strategic Partnership | Full Analysis Vision IAS Hindi · 5.5K views

भू-राजनीतिक मोर्चे पर ढाल और समकालीन कूटनीति

शीत युद्ध के दौर से लेकर आज तक, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में जब-जब भारत के खिलाफ पश्चिमी देशों ने कश्मीर या अन्य संवेदनशील मुद्दों पर दबाव बनाने की कोशिश की, तब-तब सोवियत संघ और बाद में रूस ने 'वीटो पावर' का इस्तेमाल कर भारत के हितों की रक्षा की। वर्ष 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान अमेरिकी और पाकिस्तानी गठबंधनों के मुकाबले सोवियत संघ ने जिस कूटनीतिक और सैन्य संतुलन का परिचय दिया, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

परमाणु और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी रूस ने हमेशा एक सच्चे मार्गदर्शक की भूमिका निभाई है। जब भारत को क्रायोजेनिक इंजन या परमाणु तकनीक देने से पश्चिमी देशों ने इनकार कर दिया था, तब रूस ने बिना किसी हिचकिचाहट के भारत के साथ अपने तकनीकी ज्ञान को साझा किया। कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र इसका एक जीवंत उदाहरण है, जो आज भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर रहा है। इसके अलावा, अंतरिक्ष अनुसंधान में 'आर्यभट्ट' से लेकर गगनयान मिशन तक रूसी सहयोग ने भारतीय वैज्ञानिकों का मनोबल बढ़ाया है।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जब भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और पश्चिमी दबाव अपनी चरम सीमा पर है, तब भी भारत और रूस की दोस्ती अडिग रही है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और तमाम आलोचनाओं के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने व्यापारिक और ऊर्जा संबंधों को प्राथमिकता दी, जो इस बात का प्रमाण है कि यह साझेदारी किसी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाली नहीं है।

निष्कर्षतः, यह स्पष्ट है कि रूस केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि भारत का वह भरोसेमंद और परखा हुआ मित्र है जिसने हर विकट परिस्थिति में भारत का साथ दिया है। बदलती दुनिया में यह अटूट रिश्ता आज भी क्षेत्रीय शांति, वैश्विक संतुलन और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार स्तंभ बना हुआ है।

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