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दुनिया के नक्शे पर जब हम रूस को देखते हैं, तो एक विशालकाय शक्ति का आभास होता है, लेकिन आज की भू-राजनीतिक हकीकत यह है कि रूस को अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए भारत की जितनी जरूरत आज है, उतनी शीतयुद्ध के चरम पर भी नहीं थी। यह केवल पुरानी दोस्ती या 'ध्रुवतारे' जैसा स्थायी रिश्ता भर नहीं है; बल्कि यह रूस के लिए एक रणनीतिक ऑक्सीजन की तरह है। पश्चिमी प्रतिबंधों की कड़वाहट और चीन की बढ़ती दादागिरी के बीच, भारत ही वह इकलौता वैश्विक खिलाड़ी है जो क्रेमलिन को अंतरराष्ट्रीय अलगाव की खाई में गिरने से बचा सकता है।
इतिहास की राख से उभरती एक नई रणनीतिक मजबूरी
रूस और भारत के संबंधों को अक्सर 'विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी' के मखमली शब्दों में लपेटा जाता है, लेकिन इसकी जड़ें अब भावुकता से कहीं अधिक ठोस यथार्थवाद पर टिकी हैं। सोवियत संघ के पतन के बाद, रूस ने अपनी खोई हुई गरिमा को पाने के लिए जो संघर्ष किया, उसमें भारत हमेशा एक स्थिर कारक रहा। आज जब यूक्रेन संकट के बाद पश्चिम ने मास्को के दरवाजे बंद कर दिए हैं, तो रूस की नजरें पूर्व की ओर मुड़ी हैं। लेकिन यहाँ एक पेंच है। रूस कभी नहीं चाहेगा कि वह पूरी तरह से बीजिंग का एक 'कनिष्ठ साझेदार' या जूनियर पार्टनर बनकर रह जाए। यहीं भारत की भूमिका एक 'बैलेंसर' के रूप में उभरती है।
भारत न केवल रूसी रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा खरीदार रहा है, बल्कि वह रूस के विशाल ऊर्जा संसाधनों—तेल और गैस—के लिए एक अथाह बाजार भी है। जब यूरोप ने रूसी तेल पर अपनी खिड़कियाँ बंद कीं, तब भारतीय रिफाइनरियों ने रूस की अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाया। यह कोई खैरात नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी कूटनीति थी जिसने रूस को यह भरोसा दिलाया कि वह एशिया में अकेला नहीं है। रूस जानता है कि यदि भारत उसके पाले से खिसक गया, तो यूरेशियाई क्षेत्र में उसकी आवाज केवल चीन की प्रतिध्वनि बनकर रह जाएगी।
चीन का बढ़ता साया और रूस की संप्रभुता का संकट
रूस के लिए सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक डर यह है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था के लिए पूरी तरह से चीन पर निर्भर न हो जाए। चीन की 'बेल्ट एंड रोड' पहल और मध्य एशिया में उसका बढ़ता दखल रूस के पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र को चुनौती दे रहा है। ऐसे में, रूस को एक ऐसे शक्तिशाली साझेदार की दरकार है जिसकी अपनी एक स्वतंत्र विदेश नीति हो और जो किसी भी महाशक्ति के आगे घुटने न टेके। भारत इस सांचे में पूरी तरह फिट बैठता है।
मल्टीपोलरिटी या बहुध्रुवीय विश्व का जो नारा पुतिन देते हैं, वह भारत के बिना अधूरा है। रूस को अपनी रक्षा तकनीक और अत्याधुनिक एस-400 जैसी प्रणालियों के लिए भारत जैसा विश्वसनीय और बड़ा खरीदार चाहिए, जो न केवल पैसा दे सके बल्कि तकनीक के सह-उत्पादन में भी सक्षम हो। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता रूस को वह वैश्विक वैधता प्रदान करती है, जिसे छीनने की कोशिश वाशिंगटन सालों से कर रहा है। रूस के लिए भारत केवल एक बाजार नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक स्वायत्तता की ढाल है। यदि भारत आज रूस का साथ छोड़ दे, तो वैश्विक मंच पर रूस की सौदेबाजी की शक्ति आधी रह जाएगी।
भू-राजनीतिक बिसात पर भारत की अनिवार्य उपस्थिति
व्यावहारिक धरातल पर देखें तो रूस को आर्कटिक क्षेत्र के विकास से लेकर उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) तक भारत के निवेश और सहयोग की सख्त जरूरत है। आर्कटिक में बर्फ पिघलने के साथ जो नए व्यापारिक मार्ग खुल रहे हैं, उनमें रूस चाहता है कि भारतीय कंपनियाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं ताकि वहाँ चीन का एकाधिकार न हो सके। यह रूस की दूरगामी सोच है जहाँ वह 'ग्रेटर यूरेशिया' के अपने सपने को भारत के सहयोग से साकार करना चाहता है।
इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत की बढ़ती साख रूस को एक ऐसा नैतिक समर्थन देती है जो उसे किसी अन्य देश से नहीं मिल सकता। रूस की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा निर्यात पर टिका है, और भारत की ऊर्जा भूख आने वाले दशकों में केवल बढ़ने वाली है। यह एक ऐसा चक्र है जहाँ रूस की आर्थिक स्थिरता सीधे तौर पर भारत के विकास पथ से जुड़ गई है। रूस समझ चुका है कि पश्चिम से कटे होने के दौर में, नई दिल्ली की दोस्ती ही वह पुल है जो उसे वैश्विक मुख्यधारा से जोड़े रखती है। बिना भारत के, रूस का 'एशियाई टर्न' महज एक अधूरा और जोखिम भरा प्रयोग बनकर रह जाएगा।
भारत-रूस संबंधों में सामान्य गलतियाँ और विशेषज्ञ सुझाव
अक्सर भू-राजनीतिक विश्लेषणों में यह मान लिया जाता है कि रूस के साथ भारत का रिश्ता केवल रक्षा सौदों तक सीमित है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक बड़ी गलतफहमी है। वर्तमान समय में रूस को भारत की जरूरत केवल एक ग्राहक के रूप में नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय रणनीतिक संतुलनकर्ता के रूप में है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को रूस के साथ अपने संबंधों को केवल 'क्रेता-विक्रेता' के चश्मे से नहीं देखना चाहिए।
एक सामान्य गलती पश्चिमी दबाव में रूस को पूरी तरह नजरअंदाज करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस के पास मौजूद प्राकृतिक संसाधन और आर्कटिक क्षेत्र में पहुंच भारत की भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है। विशेषज्ञ टिप यह है कि भारत को 'मेक इन इंडिया' के तहत रूस के साथ संयुक्त उपक्रमों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि केवल तैयार उत्पादों के आयात पर। इसके अलावा, भुगतान प्रणालियों (जैसे रुपया-रुबल व्यापार) में आ रही तकनीकी बाधा
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