दुनिया के नक्शे को अगर आप गौर से देखें, तो चीन एक विशालकाय धब्बे की तरह फैलता जा रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो चीन ने आधिकारिक तौर पर तीन प्रमुख क्षेत्रों—तिब्बत, पूर्वी तुर्किस्तान (शिनजियांग) और इनर मंगोलिया—पर पूरी तरह कब्जा कर रखा है, लेकिन उसकी लालच यहीं खत्म नहीं होती। ताइवान पर उसका साया मंडरा रहा है और दक्षिण चीन सागर के द्वीपों से लेकर हिमालय की चोटियों तक, ड्रैगन की नजर हर उस इंच पर है जो उसकी अपनी नहीं है।

ऐतिहासिक छल और खूनी विस्तारवाद की नींव

चीन का वर्तमान भूगोल कोई प्राकृतिक विकास नहीं बल्कि एक सुनियोजित हड़प नीति का नतीजा है। 1949 में माओ त्से तुंग के सत्ता में आते ही कम्युनिस्ट पार्टी ने 'ग्रेटर चाइना' के उस खतरनाक सपने को बुनना शुरू किया, जिसने एशिया की शांति भंग कर दी। सबसे बड़ा शिकार बना तिब्बत। 1950 के दशक में जिसे चीन ने 'शांतिपूर्ण मुक्ति' का नाम दिया, वह असल में एक संप्रभु राष्ट्र की हत्या थी। हज़ारों मठ तोड़ दिए गए और दलाई लामा को निर्वासित होना पड़ा। आज तिब्बत की पहचान को चीनी संस्कृति के नीचे दफन किया जा रहा है।

ठीक यही कहानी पूर्वी तुर्किस्तान की है, जिसे दुनिया अब शिनजियांग कहती है। यहाँ के उइघुर मुसलमानों की जनसांख्यिकी को चीन ने जिस बेरहमी से बदला है, वह आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा मानवाधिकार उल्लंघन है। चीन इसे अपना अभिन्न अंग बताता है, लेकिन सच यह है कि यह इलाका कभी चीन का था ही नहीं। इनर मंगोलिया की स्थिति भी अलग नहीं है; वहाँ की घास के मैदानों को चीनी कारखानों ने निगल लिया है। यह विस्तारवाद केवल सीमाओं का नहीं, बल्कि पहचान और नस्ल के सफाए का एक भयावह अध्याय है।

रणनीतिक घेराबंदी और संप्रभुता पर चोट

चीन की कब्जा करने की पद्धति अब बदल चुकी है। अब वह सिर्फ टैंक लेकर नहीं आता, बल्कि कर्ज का जाल (Debt-Trap) बुनता है। श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ जमीन तो श्रीलंका की है, लेकिन मालिकाना हक 99 साल के लिए बीजिंग के पास चला गया। यह 'सॉफ्ट ऑक्यूपेशन' या नरम कब्जा है। दक्षिण चीन सागर में 'नाइन-डैश लाइन' के जरिए चीन ने फिलीपींस, वियतनाम और मलेशिया के समुद्री अधिकारों को पैरों तले रौंद दिया है। वहां कृत्रिम द्वीप बनाना और उन्हें सैन्य अड्डों में तब्दील करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाने जैसा है।

ताइवान का मुद्दा तो एक जलता हुआ अंगारा है। चीन इसे अपना एक बागी प्रांत मानता है, जबकि ताइवान का अपना लोकतंत्र और अपनी सेना है। बीजिंग की धमकी भरी बयानबाजी और उसके लड़ाकू विमानों की घुसपैठ बताती है कि वह किसी भी क्षण एक और बड़े कब्जे की फिराक में है। इसके अलावा, भूटान के डोकलाम और भारत के लद्दाख क्षेत्रों में चीन की 'सलामी स्लाइसिंग' रणनीति—यानी धीरे-धीरे जमीन हथियाना—ने दक्षिण एशिया को युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।

वैश्विक सुरक्षा पर इसके विनाशकारी प्रभाव

जब एक महाशक्ति अंतरराष्ट्रीय संधियों को रद्दी का टुकड़ा समझने लगे, तो पूरी दुनिया की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। चीन के इस बेलगाम विस्तारवाद ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अस्थिरता का जहर घोल दिया है। व्यापारिक मार्ग खतरे में हैं क्योंकि चीन उन समुद्री रास्तों पर अपना एकाधिकार चाहता है जहाँ से दुनिया का एक-तिहाई व्यापार गुजरता है। यह केवल जमीन का टुकड़ा छीनने की बात नहीं है, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देना है जो संप्रभुता और समानता पर टिकी है।

दुनिया के छोटे देशों के लिए चीन एक ऐसा साहूकार बन गया है जो पहले विकास का लालच देता है और फिर संप्रभुता गिरवी रख लेता है। पाकिस्तान का CPEC प्रोजेक्ट हो या अफ्रीकी देशों में चीन का निवेश, हर जगह एक अदृश्य कब्जा महसूस किया जा सकता है। अगर बीजिंग की इस भूख को समय रहते नहीं रोका गया, तो आने वाले दशकों में दुनिया का राजनीतिक मानचित्र पहचानना मुश्किल हो जाएगा। चीन की यह आक्रामकता केवल पड़ोसी देशों के लिए नहीं, बल्कि मानव अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले हर व्यक्ति के लिए एक अलार्म है।

आम गलतियाँ और विशेषज्ञ सलाह

अक्सर देखा गया है कि जब लोग चीन की विस्तारवादी नीतियों पर चर्चा करते हैं, तो वे सॉफ्ट पावर और प्रत्यक्ष सैन्य कब्जे के बीच के अंतर को नजरअंदाज कर देते हैं। पहली बड़ी गलती यह मानना है कि चीन केवल युद्ध के जरिए जमीन कब्जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आज के दौर में चीन 'डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी' (कर्ज का जाल) का अधिक उपयोग कर रहा है। श्रीलंका का