अगर आप यह सोच रहे हैं कि टच स्क्रीन फोन का जन्म आईफोन के साथ हुआ, तो आप हकीकत से कोसों दूर हैं। टच स्क्रीन तकनीक का पहला व्यावसायिक धमाका 1992 में हुआ था, जब आईबीएम (IBM) ने अपना "साइमन" पर्सनल कम्युनिकेटर पेश किया। हालांकि, इसे वैश्विक पहचान मिलने में दशकों लग गए। यह महज एक गैजेट नहीं, बल्कि इंसानी संवाद के तरीके में आया एक ऐसा भूकंप था जिसने कीपैड के साम्राज्य को हमेशा के लिए मिट्टी में मिला दिया।

तकनीकी नींव और वो शुरुआती सुगबुगाहट

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि टच स्क्रीन का विचार 1960 के दशक में ही अंकुरित हो चुका था। ई.ए. जॉनसन ने सबसे पहले कैपेसिटिव टच स्क्रीन के सिद्धांत को दुनिया के सामने रखा, लेकिन तब यह केवल एयर ट्रैफिक कंट्रोल जैसे जटिल कार्यों तक सीमित था। उस दौर में लोग बटन दबाने के इतने आदी थे कि कांच को छूकर मशीन चलाना किसी विज्ञान फंतासी फिल्म जैसा लगता था। 1980 के दशक में एचपी (HP) ने अपने 150 मॉडल के साथ इसे कंप्यूटर की दुनिया में उतारा, मगर वहां भी यह अपनी जगह पुख्ता नहीं कर पाया।

असली हलचल तब शुरू हुई जब मोबाइल फोन छोटे होने लगे। इंजीनियरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—स्क्रीन बड़ी रखनी है और कीपैड भी देना है। इस विरोधाभास ने वैज्ञानिकों को मजबूर किया कि वे बटन को ही गायब कर दें। 90 के दशक की शुरुआत में जब आईबीएम साइमन आया, तो उसमें न केवल टच स्क्रीन थी, बल्कि वह फैक्स भेजने और ईमेल पढ़ने में भी सक्षम था। वह फोन अपने समय से इतना आगे था कि आम जनता उसकी उपयोगिता को पूरी तरह समझ ही नहीं पाई। वह एक भारी-भरकम ईंट जैसा दिखता था, लेकिन वही ईंट आज के स्लिम स्मार्टफोन की नींव बनी।

टच स्क्रीन का विकास: प्रतिरोधक बनाम धारिता (Resistive vs Capacitive)

तकनीक के इस सफर में दो बड़े खेमे थे। शुरुआती दौर में 'रेसिस्टिव' (Resistive) स्क्रीन का बोलबाला था। यह तकनीक दबाव पर आधारित थी। यानी आपको स्क्रीन को थोड़ा जोर से दबाना पड़ता था या किसी स्टाइलिश पेन (Stylus) का सहारा लेना पड़ता था। नोकिया के शुरुआती मॉडल्स और मोटोरोला के कुछ फोन्स इसी तकनीक पर चलते थे। यह सटीक तो थी, लेकिन इसमें वह मखमली अहसास नहीं था जिसे हम आज 'स्मूथ स्क्रॉलिंग' कहते हैं।