सृष्टि के आरंभ से ही जब निर्वात में शब्द की गूंज हुई, तब उस स्वर और बोध को साकार करने वाली शक्ति को ही हमने सरस्वती कहा। शिक्षा की देवी निस्संदेह माँ सरस्वती हैं, जो केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं, बल्कि उस ऋतंभरा प्रज्ञा की स्वामिनी हैं जिससे विवेक का जन्म होता है। वे केवल पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि चेतना का वह धवल प्रकाश हैं जो अज्ञान के तमस को चीरकर मनुष्य को 'अमृतत्व' की ओर ले जाता है।

ब्रह्म की शक्ति और विद्या का आदि स्रोत: एक दार्शनिक पृष्ठभूमि

भारतीय वांग्मय में सरस्वती को 'ब्रह्मवादिनी' कहा गया है। यह शब्द अपने आप में पूर्ण है क्योंकि यह सिद्ध करता है कि विद्या कोई अर्जित वस्तु नहीं, बल्कि ब्रह्म का ही प्रकटीकरण है। ऋग्वेद के सूक्तों से लेकर उपनिषदों की गूढ़ ऋचाओं तक, सरस्वती का उल्लेख एक ऐसी सरिता के रूप में मिलता है जो जड़ता को धो डालती है। उन्हें 'वाक्' की देवी माना गया है—अर्थात वह वाणी जो विचार को मूर्त रूप देती है। बिना वाणी के ज्ञान शून्य है, और बिना ज्ञान के वाणी प्रलाप है।

श्वेत वस्त्रावृता और वीणा-वादिनी का रूपक अत्यंत गहरा है। सफेद रंग सत्व गुण का प्रतीक है, जो यह संदेश देता है कि शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य मन की निर्मलता है। आज की आपाधापी वाली शिक्षा पद्धति में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि ज्ञान का भार तभी ढोया जा सकता है जब चरित्र निष्कलंक हो। सरस्वती के हाथों में स्थित पुस्तक आत्म-बोध का संदूक है, तो माला निरंतर अभ्यास और ध्यान की परिचायक है। यह सामंजस्य ही किसी भी जिज्ञासु को साधारण छात्र से एक ऋषि या विद्वान में रूपांतरित करता है।