नीति आयोग की शासी परिषद (Governing Council) की अब तक कुल 9 बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं। 27 जुलाई, 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नई दिल्ली में संपन्न हुई नौवीं बैठक इस श्रृंखला की नवीनतम कड़ी थी। यह केवल बैठकों का एक आंकड़ा मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत के 'सहकारी संघवाद' की जीवंत तस्वीर पेश करता है। नीति आयोग ने 2015 में योजना आयोग को प्रतिस्थापित किया था, और तब से ये बैठकें देश के विकास एजेंडे को तय करने वाला सबसे बड़ा मंच बन गई हैं।

पृष्ठभूमि और संरचनात्मक नींव: योजना आयोग से सहकारी संघवाद तक का सफर

भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में 1 जनवरी, 2015 की तारीख एक बड़े 'पैराडाइम शिफ्ट' का गवाह बनी। दशकों पुराने सोवियत शैली के योजना आयोग को विदा कर 'नीति' (National Institution for Transforming India) आयोग का गठन किया गया। पुराने ढर्रे में विकास की दिशा 'टॉप-डाउन' यानी केंद्र से राज्यों की ओर होती थी, लेकिन नीति आयोग ने इसे 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण में बदल दिया। इस नए ढांचे की रीढ़ इसकी शासी परिषद है।

इस परिषद की संरचना विशिष्ट है। इसमें भारत के प्रधानमंत्री, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल और विशेष आमंत्रित सदस्य शामिल होते हैं। यह कोई औपचारिक गेट-टुगेदर नहीं है, बल्कि एक ऐसा रणक्षेत्र है जहां नीतिगत विचारों का मंथन होता है। जब हम बैठकों के इतिहास को देखते हैं, तो पहली बैठक 8 फरवरी, 2015 को हुई थी, जिसने इस नए संस्थान के कामकाज की दिशा निर्धारित की। इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं पर एक साझा दृष्टिकोण विकसित करना था, ताकि राज्यों के बीच 'प्रतिस्पर्धी संघवाद' के साथ-साथ 'सहकारी संघवाद' को भी बढ़ावा दिया जा सके।

शासी परिषद का सचिवालय केवल फाइलों का अंबार नहीं लगाता, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि राज्यों की आवाजें दिल्ली के गलियारों में अनसुनी न रह जाएं। क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय लक्ष्यों के बीच संतुलन साधना ही इन बैठकों का बुनियादी मंत्र रहा है।

बैठकों का मुख्य विश्लेषण: नीतिगत बदलावों और रणनीतिक निर्णयों का लेखा-जोखा

इन 9 बैठकों के दौरान भारतीय शासन व्यवस्था ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। हर बैठक का अपना एक विशिष्ट एजेंडा रहा है, जो उस समय की तात्कालिक चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं को दर्शाता है। उदाहरण के तौर पर, प्रारंभिक बैठकों में कृषि क्षेत्र के कायाकल्प, स्वच्छ भारत अभियान और कौशल विकास जैसे विषयों पर उप-समितियां बनाई गईं। यह एक अभिनव प्रयोग था जहां मुख्यमंत्रियों को ही इन समितियों का नेतृत्व सौंपा गया, जिससे राज्यों में स्वामित्व का भाव पैदा हुआ।

चौथी और पांचवीं बैठकों के दौरान, 'एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट्स प्रोग्राम' (आकांक्षी जिला कार्यक्रम) और जल शक्ति मिशन जैसे बड़े फैसलों पर गहन चर्चा हुई। परिषद ने केवल लक्ष्यों को निर्धारित नहीं किया, बल्कि उनकी निगरानी के लिए 'परफॉर्मेंस डैशबोर्ड' की संस्कृति को भी बढ़ावा दिया। बैठकों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा है कि यहां केंद्र और राज्य सरकारों के बीच होने वाले टकरावों को कम करने और विकास के मुद्दों पर सर्वसम्मति बनाने का प्रयास किया जाता है।

हालिया नौवीं बैठक (जुलाई 2024) का मुख्य केंद्र 'विकसित भारत @ 2047' का रोडमैप तैयार करना था। इसमें राज्यों को विकास के प्रमुख इंजन के रूप में देखा गया। दिलचस्प बात यह है कि इन बैठकों में चर्चा केवल जीडीपी विकास दर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसमें सामाजिक न्याय, बुनियादी ढांचा और डिजिटल इंडिया जैसे व्यापक पहलुओं को भी शामिल किया जाता है। राज्यों द्वारा उठाए गए स्थानीय मुद्दों, जैसे कि हिमालयी राज्यों की विशेष चुनौतियां या तटीय राज्यों की आपदा प्रबंधन की जरूरतें, को भी इन बैठकों में गंभीरता से सुना जाता है।

व्यावहारिक निहितार्थ: आम आदमी और प्रशासनिक ढांचे पर क्या प्रभाव पड़ा?

नीति आयोग की इन बैठकों का प्रभाव केवल सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं है, इसके व्यावहारिक परिणाम आम नागरिक के जीवन में साफ देखे जा सकते हैं। जब शासी परिषद में कृषि नीति पर चर्चा होती है, तो उसका सीधा संबंध किसान की आय और बाजार तक उसकी पहुंच से होता है। राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा शुरू हुई है, जिसका परिणाम हमें नीति आयोग द्वारा जारी किए जाने वाले 'SDG इंडिया इंडेक्स' या 'हेल्थ इंडेक्स' में दिखता है।

प्रशासनिक स्तर पर, इन बैठकों ने 'वन साइज फिट्स ऑल' की पुरानी मानसिकता को खत्म किया है। अब नीतियां बनाते समय तमिलनाडु की भौगोलिक स्थिति और राजस्थान की जलवायु भिन्नताओं का ध्यान रखा जाता है। यह विकेंद्रीकरण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके अतिरिक्त, केंद्र प्रायोजित योजनाओं (CSS) के युक्तिकरण और उनके बेहतर क्रियान्वयन के लिए राज्यों को जो लचीलापन मिला है, वह इन्हीं बैठकों में हुए विचार-विमर्श का परिणाम है।

व्यवसाय की सुगमता (Ease of Doing Business) के मोर्चे पर भी इन बैठकों ने क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। राज्यों ने अपनी प्रक्रियाओं को सरल बनाया है ताकि निवेश को आकर्षित किया जा सके। अंततः, इन बैठकों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही लेकर आई हैं। जब मुख्यमंत्री एक ही मेज पर बैठकर एक-दूसरे के 'बेस्ट प्रैक्टिसेज' साझा करते हैं, तो उससे पूरे देश को लाभ होता है। यह एक सामूहिक प्रयास है जो भारत को एक वैश्विक आर्थिक शक्ति बनाने की दिशा में अग्रसर कर रहा है।

नीति आयोग की बैठकों के सफल संचालन में चुनौतियां और विशेषज्ञ सुझाव

नीति आयोग की शासी परिषद (Governing Council) की बैठकें भारतीय संघवाद का आधार स्तंभ हैं, लेकिन अक्सर इनमें कुछ निवारक बाधाएं (Pitfalls) देखी जाती हैं। सबसे बड़ी चुनौती बैठकों में राजनीतिक मतभेदों के कारण कुछ राज्यों की अनुपस्थिति होती है। जब मुख्यमंत्री बैठकों में शामिल नहीं होते, तो उस राज्य की विशिष्ट समस्याओं पर चर्चा का मंच अधूरा रह जाता है। इसके अलावा, सीमित समय में राज्यों की विशाल कार्यसूची (Agenda) को कवर करना मुश्किल होता है, जिससे चर्चा सतही रह सकती है।

विशेषज्ञ सुझाव: इन बैठकों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए विशेषज्ञों का मानना है कि 'क्षेत्रीय परिषदों' (Regional Councils) को अधिक सक्रिय किया जाना चाहिए। मुख्य बैठक से पहले राज्यों को अपनी उप-समितियों के माध्यम से तकनीकी डेटा साझा कर लेना चाहिए। सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि बैठकों का एजेंडा केवल केंद्र-प्रायोजित योजनाओं तक सीमित न रहकर राज्यों के नवाचारों पर भी केंद्रित हो। विशेषज्ञों के अनुसार, डेटा-संचालित फीडबैक तंत्र (Data-driven feedback mechanism) को अपनाने से राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा (Competitive Federalism) को बढ़ावा मिलेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. नीति आयोग की शासी परिषद की बैठक की अध्यक्षता कौन करता है?

नीति आयोग की शासी परिषद की बैठक की अध्यक्षता अनिवार्य रूप से भारत के प्रधानमंत्री करते हैं। उनकी अनुपस्थिति में या विशेष परिस्थितियों में, परिषद के अन्य सदस्यों के साथ समन्वय किया जाता है, लेकिन मुख्य निर्णय और संबोधन प्रधानमंत्री द्वारा ही दिया जाता है। इसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होते हैं।

2. क्या नीति आयोग की बैठकें हर साल आयोजित की जाती हैं?

आमतौर पर शासी परिषद की बैठक प्रतिवर्ष आयोजित करने का प्रयास किया जाता है, लेकिन इसकी कोई निश्चित संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है। बैठकों का आयोजन राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं और महत्वपूर्ण नीतिगत बदलावों की आवश्यकता के आधार पर किया जाता है। अब तक कई महत्वपूर्ण बैठकें हो चुकी हैं, जिनमें कृषि, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे विषयों पर चर्चा हुई है।

3. क्या इन बैठकों के निर्णय राज्यों के लिए बाध्यकारी होते हैं?

नहीं, नीति आयोग एक सलाहकारी निकाय (Think Tank) है। इसकी बैठकों में लिए गए निर्णय साझा सहमति पर आधारित होते हैं। आयोग का मुख्य कार्य रणनीतिक और तकनीकी सलाह देना है। हालांकि, चूंकि इसमें प्रधानमंत्री और सभी राज्यों के प्रमुख शामिल होते हैं, इसलिए यहां बनी सहमति का प्रभाव नीतियों के कार्यान्वयन और फंड आवंटन की दिशा पर स्पष्ट रूप से पड़ता है।

संपादकीय निर्णय (Editorial Verdict)

नीति आयोग की बैठकें केवल कागजी कार्रवाई या औपचारिक चर्चा नहीं हैं, बल्कि ये 'टीम इंडिया' की अवधारणा को साकार करने का सबसे बड़ा मंच हैं। योजना आयोग के शीर्ष-डाउन दृष्टिकोण के विपरीत, नीति आयोग की बैठकें राज्यों को अपनी बात रखने का समान अवसर देती हैं। मेरा मानना है कि इन बैठकों की सफलता केवल आयोजन की संख्या में नहीं, बल्कि इस बात में है कि बैठक के बाद राज्यों और केंद्र के बीच कितना 'विश्वास' बढ़ा है। यदि हम राजनीतिक मतभेदों को विकास के एजेंडे से अलग रख सकें, तो ये बैठकें भारत की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर बनाने की दिशा में सबसे प्रभावी उपकरण साबित होंगी।