भारत की आर्थिक नीति का मूल मंत्र वर्तमान में 'आत्मनिर्भरता' और 'खुली अर्थव्यवस्था' का एक अनूठा मिश्रण है। यह केवल व्यापारिक आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि 1.4 अरब लोगों की आकांक्षाओं को वैश्विक बाजार से जोड़ने का एक साहसिक प्रयास है। संक्षेप में कहें तो, भारत आज राजकोषीय विवेक, बुनियादी ढांचे पर भारी सार्वजनिक व्यय और डिजिटल क्रांति के माध्यम से अपनी विकास दर को सात प्रतिशत से ऊपर बनाए रखने की रणनीति पर चल रहा है, जिससे वह विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और नीतिगत आधार: नेहरूवादी समाजवाद से बाजारवाद तक का सफर

आर्थिक नीतियों की जड़ें हमेशा इतिहास में गहरी होती हैं। 1947 के बाद भारत ने एक 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' को चुना, जहाँ राज्य के पास कमांडिंग हाइट्स थीं। लेकिन 1991 के भुगतान संतुलन संकट ने सब कुछ बदल दिया। वह एक ऐसा मोड़ था जहाँ हमने 'लाइसेंस राज' की बेड़ियों को काटकर उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) को गले लगाया। आज की नीति उसी सुधारवादी प्रक्रिया का एक परिष्कृत और अधिक आक्रामक संस्करण है।

वर्तमान सरकार की नीतिगत रूपरेखा 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे

आम गलतियाँ और विशेषज्ञों के सुझाव

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