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सृष्टि के उद्गम का प्रश्न मानव चेतना को अनंत काल से झकझोरता रहा है। यदि हम सीधे और स्पष्ट शब्दों में कहें, तो सनातन दर्शन के अनुसार शिव और विष्णु में से कोई भी एक-दूसरे के बाद नहीं आया; दोनों एक ही परम तत्व के दो भिन्न स्वरूप हैं। अद्वैत वेदांत और पुराणों की गहरी परतों को खंगालने पर यह स्पष्ट होता है कि आदि और अंत से परे जो तत्व है, उसे ही कहीं शिव तो कहीं विष्णु कहा गया है। इसलिए, किसी एक को 'पहला' घोषित करना इंसानी बुद्धि की सीमित सोच का परिणाम है, जबकि सत्य इस विभाजन से कोसों दूर है।
ब्रह्मांडीय चेतना का आधार और वैदिक दृष्टिकोण
इस दार्शनिक गुत्थी को सुलझाने के लिए हमें इतिहास और श्रुतियों के पन्नों को पलटना होगा। ऋग्वेद का 'नासदीय सूक्त' कहता है कि सृष्टि से पहले न सत् था, न असत्। तमस में छुपा हुआ कुछ था, जिसे ऋषियों ने 'एकम् सत्' कहा। जब इस निर्गुण ब्रह्म में सृष्टि रचने की इच्छा जागृत हुई, तब सगुण साकार रूप प्रकट हुए। शैव मत के ग्रंथ, जैसे शिव पुराण, यह प्रतिपादित करते हैं कि सर्वप्रथम सदाशिव थे। उनकी इच्छा से शक्ति प्रकट हुईं और फिर विष्णु और ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। इसके विपरीत, वैष्णव मत के आधार स्तंभ श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण में वर्णित है कि महाविष्णु के नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए और ब्रह्मा के भाल से रुद्र का प्राकट्य हुआ।
भाषा और प्रतीकों के इस जाल को यदि हम ध्यान से देखें, तो यह पहेली और उलझती जाती है। एक साधारण मानव मस्तिष्क रैखिक समय (linear time) में सोचता है—जहां पहले 'क' आता है और फिर 'ख'। परंतु सनातन काल चक्र वृत्ताकार है। यहाँ उत्पत्ति, स्थिति और लय एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समझें तो ऊर्जा न तो पैदा की जा सकती है और न ही नष्ट। शिव यदि उस ऊर्जा का संहारक या रूपांतरणकारी रूप हैं, तो विष्णु उसे संतुलित रखने वाली व्यवस्था हैं। बिना रूपांतरण के व्यवस्था कैसी, और बिना व्यवस्था के रूपांतरण कैसा? दोनों समकालीन और अन्योन्याश्रित हैं।
तत्वमीमांसा का गहरा विश्लेषण: हरिहर स्वरूप
जब हम शाब्दिक विवादों से ऊपर उठकर 'तत्वमीमांसा' (Metaphysics) के धरातल पर कदम रखते हैं, तो हमें 'हरिहर' का विस्मयकारी स्वरूप दिखाई देता है। शास्त्रों में बार-बार उद्घोष किया गया है—"शिवाय विष्णु रूपाय, शिव रूपाय विष्णवे" अर्थात शिव ही विष्णु हैं और विष्णु ही शिव हैं। दोनों के बीच भेद देखना अज्ञानता का सबसे बड़ा लक्षण माना गया है।
विचारणीय बात यह है कि दोनों ही देव एक-दूसरे की आराधना करते हैं। रामायण में प्रभु श्रीराम (जो विष्णु के अवतार हैं) रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना कर कहते हैं कि जो शिव से द्रोह कर मेरी भक्ति पाना चाहता है, वह मुझे स्वप्न में भी प्रिय नहीं। वहीं दूसरी ओर, शिव निरंतर अपने हृदय में 'राम' नाम का जप करते रहते हैं। समुद्र मंथन के समय जब हलाहल विष निकला, तब सृष्टि की रक्षा के लिए शिव ने उसे पी लिया, लेकिन उस विष की ज्वाला को शांत करने के लिए विष्णु ने अपने शीतल स्वरूप का ध्यान उनके हृदय में धर दिया। यह घटना दर्शाती है कि दोनों के क्रियाकलाप अलग हो सकते हैं, किंतु उनकी आत्मा और उद्देश्य बिल्कुल एक हैं। शिव वैराग्य के शिखर हैं, तो विष्णु गृहस्थ और लोक-कल्याण के आदर्श। एक श्मशान में भस्म रमाता है, तो दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर ऐश्वर्य में वास करता है। ये विरोधाभास असल में ब्रह्मांड के दो ध्रुव हैं, जो मिलकर एक पूर्ण वृत्त बनाते हैं।
समकालीन जीवन और वैचारिक प्रासंगिकता
इस विमर्श का हमारे व्यावहारिक जीवन और आधुनिक समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है? अक्सर संकीर्ण मानसिकता के कारण मध्यकाल में शैव और वैष्णव संप्रदायों के बीच भारी टकराव देखने को मिले, जिसने समाज को कमजोर किया। इस श्रेष्ठता की जंग को समझना इसलिए जरूरी है ताकि हम मतभेदों के पीछे छिपी एकता को पहचान सकें।
आज का मानव जब इस सवाल से जूझता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि यह द्वंद्व बाहरी दुनिया का नहीं, बल्कि उसके भीतर के दो विचारों का है। शिव हमारे भीतर की अंतर्मुखी चेतना, ध्यान और मोहभंग का प्रतीक हैं, जो हमें अनित्य संसार से विरक्ति सिखाते हैं। विष्णु हमारी बहिर्मुखी ऊर्जा, कर्तव्यपरायणता और समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारियों के संवाहक हैं। यदि आप केवल शिव को अपनाते हैं और विष्णु को नकारते हैं, तो आप कर्म से भाग रहे हैं। यदि आप केवल विष्णु के मार्ग पर चलते हैं और शिव के वैराग्य को भूल जाते हैं, तो आप संसार के मोह जाल में फंसकर रह जाएंगे। इसलिए, जीवन की गाड़ी को सुचारू रूप से चलाने के लिए इन दोनों तत्वों का संतुलन अपरिहार्य है। श्रेष्ठता की बहस बेमानी है; प्रासंगिक तो यह है कि हम इन दोनों ऊर्जाओं को अपने भीतर कैसे समाहित करते हैं।
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