मुंबई के 7 द्वीपों का ऐतिहासिक सफर
आज जिस जगमगाते और व्यस्त शहर मुंबई को हम जानते हैं, वह हमेशा से एक बड़ा महाद्वीप या ज़मीन का विशाल टुकड़ा नहीं था। एक ज़माने में यह क्षेत्र सात अलग-अलग द्वीपों में बंटा हुआ था। जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के पास इस क्षेत्र का स्वामित्व आया, तब ये सात द्वीप भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से कटे हुए थे।
इतिहास के अनुसार, मुंबई के निर्माण की नींव रखने वाले ये सात मुख्य द्वीप बंबई (Bombay), मझगांव (Mazagaon), परेल (Parel), वर्ली (Worli), माहिम (Mahim), लिटिल कोलाबा (या ओल्ड वुमन्स आइलैंड) और कोलाबा (Colaba) थे। उस समय इन द्वीपों के बीच समुद्र का पानी बहता था और यहाँ छोटी-छोटी मछुआरों की बस्तियाँ हुआ करती थीं।
वर्ष 1668 से 1838 के दौरान, एक बड़े इंजीनियरिंग चमत्कार और भूमि पुनर्प्राप्ति (Land Reclamation) परियोजना के जरिए इन सभी सात द्वीपों को आपस में जोड़ने का काम शुरू हुआ। समुद्र को पाटकर और बड़े बांधों का निर्माण करके इन अलग-थलग हिस्सों को एक साथ पिरोया गया। दशकों की मेहनत के बाद, यह सात द्वीप मिलकर उस आधुनिक महानगर के रूप में उभरे, जिसे आज हम भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई कहते हैं।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।